
हिंदी के चर्चित कथाकार संजीव के उपन्यास ‘मुझे पहचानो’ को इस वर्ष के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है. ‘मुझे पहचानो’ सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. पहली बार यह उपन्यास 2020 में प्रकाशित हुआ था. सेतु प्रकाशन के प्रमुख अमिताभ राय ने बताया कि ‘मुझे पहचानो’ को साहित्य अकादमी मिलना बेहद गर्व का विषय है. उन्होंने बताया कि संजीव का यह उपन्यास अपने प्रकाशन से ही काफी चर्चित रहा है.
संजीव का उपन्यास ‘मुझे पहचानो’ भारत में प्रचलित सती प्रथा पर आधारित है. सती प्रथा को समाप्त करने वाले राजा राममोहन राय की भाभी पर सती प्रथा को लेकर हुए उत्पीड़न को लेकर केंद्र में रखकर यह उपन्यास लिखा गया है. कथाकार संजीव ने साहित्य अकादमी की घोषणा पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उनका यह उपन्यास स्त्रियों के शोषण की कथा कहता है. इसमें सती प्रथा, स्त्रियों के शोषण और उस समय के सामाजिक परिवेश के बारे में कई मुद्दों को शामिल किया गया है.
‘मुझे पहचानो’ उपन्यास भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत और सती प्रथा जैसी कुप्रथा के उन्मूलक राजा राममोहन राय की भाभी पर केंद्रित है. कहानी बताती है कि जब राजा राममोहन राय के भाई जगनमोहन की पत्नी को पति की मृत्यु के बाद जबरदस्ती सती किया जा रहा था, उसे जबरन चिता पर जिंदा जलाया जा रहा था, तभी बारिश होने के कारण वह अधजली रह गई. अगले दिन इस पर समाज ने विचार-विमर्श किया और उसे फिर से सती किया गया. ‘मुझे पहचानो’ की कहानी बेहद मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली है. प्रस्तुत है इस उपन्यास का एक अंश-
मुझे पहचानोः संजीव
हर दिन की तरह आज भी समापन पर अलोक मंजरी के सतीदाह का हैल्युसिनेशन-मंचन. राममोहन के बड़े भाई जगन्मोहन की मृत्यु, भाभी अलोक मंजरी को ढोल नगाड़े, तुरुही के बीच लाया जाना. पति के शव को लेकर ‘सहमरण’ के लिए बैठना, चिता की आग. लोगों का चला जाना. सुबह फिर लौटना, झाड़ियों में छुपती अलोक को लाकर पुन: चिता के हवाले करना.
जलती हुई ज्वाला/लपलपाती लपटें
अलोक मंजरी की जलती लाश-लगा, आसमान से बिजली चमकी और भयंकर गड़गड़ाहट के बीच अलोक मंजरी की चिता से एक सुंदरी औरत प्रकट हुई. उसके दोनों ओर 5-5 वर्ष के दो बच्चे थे.
“कौन है? कौन है? कैसे आ गयी?” के रोष भरे निषेधात्मक शोर की अवमानना करती, ढीठ बन आगे बढ़ कर उसने माइक को थाम लिया-
“आप सारे विद्वान सतियों की पात्रता-अपात्रता पर फिर-फिर विचार करते रहेंगे, आज एक रक्षंदा सती पर विचार कर लीजिए.”
“कौन है रक्षंदा सती?” धर्माचार्य ने टोका.
“मैं! मैं सावित्री कुंअर! इसी जगह मुझे जला कर मार डाला गया था, पांच साल पहले, इसी जगह पांच साल बाद फिर से आवभूत हो रही हूं.”
“पहचानिए मुझे, जिसे उसके जन्मदाता पिता ने नहीं पहचाना, जन्मदात्री मां ने नहीं पहचाना, रियासतदारों ने नहीं पहचाना- पहचानिए मुझे. डी.एन.ए. मिला कर देख लीजिए. एक लंबी जंजीर घेर रही है हम अलोकाओं को. हां, मैं अलोक मंजरी हूं, राजा राममोहन राय की भाभी, जिसे उनके पति जगनमोहन बैनर्जी की मौत पर मार-पीट कर सती बनाया गया था, आंधी, पानी झड़-झंझा की रात सुबह देखा कि मरी नहीं तो गांव वालों ने दोबारा जलाया.”
“सैकड़ों वर्षों से जलायी जाती रही धर्म और परंपरा की बेदी पर सैकड़ों वर्षों से. पर इसकी जिद देखिए यह मरी नहीं, रक्षंदा है. जलने के दाग- ये, ये, ये, ये.” उसने कपड़े खोल कर दाग दिखाने शुरू किये एक-एक कर.
राय साहब ने लठैतों को बुलाया, पर धर्माचार्य ने रोक दिया.
“सिर के कुछ केश जल गये थे, चमड़े जल गये थे- ये रहे. कुछ आग बाहर थी, कुछ अंदर. इस अलोक को स्वर्ग ने नहीं रोका. स्वर्ग से उतर कर आ गयी सावित्री कुंअर के रूप में आपके सामने. अपने दो बच्चों और पति…के साथ. मेरी एक संतान पूर्व ऌपति राजा उदय प्रताप के दूसरे पुत्र की है- यह लव, और दूसरी संतान इस पति से है- ये कुश, दूसरे पति अनमोल से.”
भिखारी ठाकुर के जीवन से रू-ब-रू कराता संजीव का उपन्यास ‘सूत्रधार’
“मैं आपके सामने हूं- पांच सालों से हूं आपके सामने, आपने पहचाना नहीं, क्यों? इसलिए कि आपने तो मुझे जला कर पतिलोक भेज दिया था पर मैं ढीठ लौट आयी स्वर्ग से.”
“आप चाहें तो इस अलोक मंजरी को फिर से मार कर जला दें. मेरे इस दाह में आप सभी स्त्री-पुरुष, माता-पिता शामिल रहे, सारे पुण्यार्थों, धर्म, परंपराओं, समाज- मैं आपके कठघरे में खड़ी हूं. विचार कीजिए.”
कथाकार संजीव की अन्य किताबें
कथाकार संजीव का जन्म 6 जुलाई, 1947 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के बांगरकलां गांव में हुआ था. उनका पूरा नाम राम सजीवन प्रसाद है. विज्ञान के छात्र रहे संजीव ने तालीम पूरी करने के बाद पश्चिम बंगाल में एक रासायनिक प्रयोगशाला में अपनी सेवाएं दीं. सरकारी सेवा में रहते हुए संजीव लगातार साहित्य सृजन करते रहे. सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने ‘हंस’ सहित कई साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया.
लेखक संजीव ने भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित एक उपन्यास ‘सूत्रधार’ (Sutradhar) लिखा है. तमाम शोध-अध्ययन के बाद तैयार जीवनपरक उपन्यास ‘सूत्रधार’ काफी चर्चित रहा है. संजीव ने उपन्यास, कहानी, नाटक, रिपोर्ताज, आलोचना और सामयिक विषयों पर खूब लिखा है.
संजीव की अन्य कृतियों में तीस साल का सफरनामा, आप यहां हैं, भूमिका और अन्य कहानियां, प्रेतमुक्ति, दुनिया की सबसे हसीन औरत, ब्लैक होल, खोज, गति का पहला सिद्धान्त, गुफा का आदमी, दस कहानियां, गली के मोड़ पर सूना-सा कोई दरवाजा और संजीव की कथायात्रा: पड़ाव: 1,2,3 प्रमुख हैं. ये सभी कहानी संग्रह हैं.
संजीव के चर्चित उपन्यासों में ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान!नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पांव तले की दूब’, ‘जंगल जहां शुरू होता है’, ‘सूत्रधार’, ‘आकाश चम्पा’ और ‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ शामिल हैं.
संजीव को उनके साहित्य सृजन के लिए ‘कथाक्रम सम्मान’ लखनऊ, ‘इंदु शर्मा स्मृति अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान’, ‘भिखारी ठाकुर लोक सम्मान’, ‘कथा शिखर सम्मान’ और ‘पहल’ सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.
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Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : December 20, 2023, 20:25 IST





