गीता के गूढ़ रहस्यों को अपने-अपने तरीके प्रकाशित करते हैं गीता के अलग-अलग भाष्य

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हिंदू संस्कृति में गाय को बहुत पवित्र जीव माना जाता है. इसका कारण ये है कि घास-फूस खा कर ये दूध देती है, जिसके बहुत सारे लाभप्रद उत्पाद बनते हैं, जो बहुत फायदेमंद होते हैं. विज्ञान की ओर से तरह तरह की चर्चाएं और शोध किए जा रहे हैं लेकिन दूध अभी भी सबसे अधिक गुणकारी माना जाता है. गीता को भी उसकी तरह हर प्रकार से मानव मन की चिंताओं और दुख को खत्म करने का साधन माना जाता है. यही कारण है कि गीता को सारे उपनिषदों का दूध माना जाता है, जो अमृत तुल्य है.

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।
पार्थो वत्सः सुधिभोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ।।

गीतामहात्म्य के इस छठें श्लोक का अर्थ दो तरह से किया लिया जाता है. एक अर्थ ये माना जाता है कि 108 उपनिषद गाय हैं. इन गायों को दुहने वाले श्रीकृष्ण हैं. इन गौवों का बछड़ा पार्थ यानी अर्जुन है. बछड़े के कारण ही गाय दूध देती है. बछड़े के बाद सुधिजन इस दूध का पान करते हैं. यानी ज्ञान के समस्त सागर से जो रस अर्जुन के कारण श्रीकृष्ण ने अर्जुन के लिए निकाला उसका सदुपयोग सभी सुधिजन कर सकते हैं. वैसे भी गाय को दूध देने के लिए बछड़ा तैयार करता है. ये ऐसी गाय है जिसका दूध समाप्त नहीं होता, क्योंकि ये तो ज्ञानामृत है. ज्ञान का ये प्रसाद अक्षय है, इसका अंत होता ही नहीं है.

दुनिया भर में भारतीय ग्रंथों में सबसे ज्यादा आदर गीता को ही मिलता है. इसकी तार्किकता और व्यापक विषय वस्तु, आध्यात्मिकता, जीवन पद्धति को पूरे संसार में सम्मान से देखा जाता है. तकरीबन सभी भाषाओं में इसका अनुवाद और भाष्य हो चुका है. विद्वानों का ये भी मत है कि गीता इतनी व्यापक रचना है कि हर पढ़ने वालों को अपना एक विशेष अर्थ प्राप्त होता है और ज्यादातर भाष्यकार अपनी उसी धारणा पर आगे बढ़ते हैं. रोचक ये है कि उनकी सोच न तो गलत होती है और न ही उस तरह के अर्थ से कोई हानि. गांधी उसी गीता की व्याख्या अहिंसा के लिए करते हैं तो तिलक को उग्रता मिलती है. योगियों को गीता में योग का पूरा विस्तार मिलता है.

आदि शंकर
गीता का सबसे पहला भाष्य शंकराचार्य का मिलता है. माना जाता है कि उन्होंने ही सबसे पहले प्रस्थानत्रयी लिख इसमें गीता को भी शामिल किया. इस त्रयी में वेदांग सूत्र, उपनिषद भी शामिल थे. इसे गीता का पहला भाष्य माना जाता है.

लोकमन्य तिलक की गीता
इसके बाद लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक की गीता रहस्य भी बहुत लोकप्रिय हुई. उग्र राष्ट्रवादी नेता के तौर पर मशहूर तिलक की इस रचना को महत्वपूर्ण माना जाता है. इसकी रचना बीसवीं सदी में की गई थी.

महात्मा गांधी की गीता
इसी तरह से महात्मा गांधी का भाष्य ‘गीता माता’ बहुत ही रोचक है. बापू ने तो सीधे लिख दिया है कि उनकी किसी भी समस्या का हल गीता से मिल जाता है. ये भी रोचक है कि गांधी ने शुरू में गीता का अध्ययन नहीं किया था. बल्कि इसाई मित्रों के सवालों का जवाब देने के लिए वे गीता की ओर गए. विलायत में जो भी उनसे मिलता वह गीता के बारे में सवाल करता. इन सवालों का जवाब देने के लिए उन्होंने गीता का अध्ययन शुरू किया और आखिरकार उन्होंने बहुत ही अच्छा भाष्य ‘गीता माता’ के नाम से किया.

श्रील पभुपाद की गीता
गीता का एक भाष्य ‘यथारूप गीता’ के तौर पर उपलब्ध है. इसे इस्कॉन के प्रवर्तक श्रील प्रभुपाद ने तैयार किया है. इसमें गीता के श्लोकों का शब्दशः अन्य भाषाओं में अनुदित किया गया है. ये भी अंग्रेजी, हिंदी समेत देश और दुनिया की तमाम भाषाओं में उपलब्ध है. इसे इस्कॉन की ओर से रिआयती कीमत पर बेचा जाता है.

आचार्य रजनीश की गीता
आचार्य रजनीश ने भी गीता का भाष्य ‘गीता दर्शन’ के नाम से किया है. आठ भागों में छपी इस किताब में रजनीश के दर्शन के मुताबिक इसमें विषयवस्तु को बहुत तार्किक विस्तार दिया गया है.

स्वामी अड़गड़ानंद की गीता
एक आधुनिक मनीषी अड़गड़ानंद जी को इसमें स्वरों यानी सांसों का योग मिलता है. तकरीबन सभी भाषओं में प्रकाशित उनके भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में अड़गड़ानंद जी लिखते हैं – अगर तिल-जौ और घी वगैरह के हवन से बारिश होनी होती, या देवताओं की प्रसन्नता मिल सकती तो सारे देश के तिल जौ और घृत का हवन कर दिया जाता. सारे काम बन जाते. लेकिन गीता में श्रीकृष्ण ने जिस हवन की बात कही है वो अलग-अलग प्राणों को अलग -अलग प्राणों में मिलाने की है. योग में इसी क्रिया को प्रणायाम कहा जाता है. योग-शास्त्र के मुताबिक पांच प्राण होते हैं और प्रणायाम इन्हीं को साधने की कला मात्र है. इसी साधना से श्रीकृष्ण के मूल स्वरूप यानी श्रीहरि या ओम को सिद्ध किया जा सकता है. इसी से मनुष्य आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ता है. ये भी गीता के उद्देश्यों में से एक है.

इसके पहले अनेक विद्वान गीता पर भाष्य रच चुके हैं. कई भाष्यों में एक दोष ये आ जाता है कि रचनाकार अपने मत के चश्मे से ही गीता को भी देखने की कोशिश करते हैं. इससे गीता के मूल भाव खासकर उसके विशुद्ध आध्यात्मिक पक्ष पर असर पड़ता है. इस कारण भी गीता के बहुत सारे भाष्य रचे गए. फिर भी गीता के रहस्यों की खोज में लगे मुमुक्षु गीता के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए साधना में लगे रहते हैं. बहुत से ऐसे साधक हैं जिनके लिए गीता ही सब कुछ है.

Tags: Bhagwat Geeta, Hindi Literature

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