
यह सच है कि एक लेखिका की जीवन-कथा उसके लेखन के बराबर महत्त्वपूर्ण हो जाती है. उसका अपना वजूद, चाहे वह कितना भी धुंधला क्यों न हो, एक तरह से उसके लेखन का ही हिस्सा बन जाता है. उसकी अपनी खुद की कहानी उसके कथा-लेखन में कहीं न कहीं आकर बैठ ही जाती है और उसकी कृतियों के विषय सामाजिक व्यवस्था की कगार पर उसके अपने संकटपूर्ण अस्तित्व को मार्मिक तरीके से गौरतलब बना देते हैं. जब हम हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र की ज़िंदगी के बारे में बात करते हैं, तो उनकी प्रेमिका मल्लिका के नाम के पन्ने अपने आप खुलते चले जाते हैं.
कवि और उपन्यासकार के रूप में जानी जानें वाली मल्लिका की ज़िंदगी में एक वक्त ऐसा भी आया जब वह उपन्यास लिखने की कोशिश कर रही थीं. ये वही समय था जब आंतरिक अनुभूतियों, व्यक्तिगत द्वंद्व और सामाजिक मंच की भाषा हिंदी में ईज़ाद की जा रही थी. मल्लिका बंगाल से थीं और बनारस की गलियों में अपने साथ कोलकाता की प्रगतिशील धाराओं का ज्ञान लेकर आई थीं. मल्लिका का शुरुआती काम भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850- 1885) से अन्तरंग रूप से जुड़ा हुआ था. भारतेंदु ही मल्लिका के रक्षक थे और वे ही संरक्षक.
परंपरा, नवाचार और पुराने अभिजन का हिस्सा होने के बावजूद भारतेंदु रीति-रिवाजों का विरोध करते थे. यही वजह थी कि उन्होंने स्त्री के जुड़े सवालों पर अपने कई तरह के मत प्रकट किए थे. उन्होंने अपने एक उपन्यास में उन प्रगतिशील रीति-रिवाजों का पक्ष लिया है, जो उनके अपने समय में संभव ही नहीं था, हालांकि बाद में इसका श्रेय मल्लिका को दिया गया.
मल्लिका का रचना-संसार : वसुधा डालमिया
वसुधा डालमिया की पुस्तक ‘मल्लिका का रचना-संसार’ के अनुसार, हरिश्चंद्र की बनारस में बहुत विशिष्ट स्थिति थी. वे शहर के व्यापारिक प्रभुवर्ग से थे. अपने पिता की तरह उन्होंने शहर के सांस्कृतिक जीवन में एक नेतृत्वकारी भूमिका निभाई और उनके यहां जमने वाली कवियों की महफ़िलें और संगीत संध्याएं अपने समय में मशहूर थीं. मल्लिका अकेली स्त्री नहीं थीं जिनके साथ उनके सम्बन्ध थे, लेकिन मल्लिका का उनके जीवन में विशेष स्थान था.
गौरतलब है, कि मल्लिका संभवत: भारतेंदु की स्त्री-केंद्रित अल्पायु पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ के कई लेखों में सह-लेखिका होने के साथ-साथ ‘कुलीन कन्या’ अथवा ‘चंद्रप्रभा और पूर्णप्रकाश’ का पूरी तरह से तो नहीं, लेकिन निश्चित रूप से सह-लेखन अवश्य किया था. उन्होंने जिस तरह का प्रगतिशील साहित्यिक लेखन किया, उसके लिए उन्हें निस्संदेह हरिश्चंद्र के नाम और समर्थन की ज़रूरत थी. अपने औपन्यासिक लखन में मध्यवर्गीय गृहिणी, शिक्षित और सुसंस्क-त जीवनसाथी तथा माता (वास्तव में बमगाली उपन्यासों और कहानियों की भद्र महिला) के नए घरेलू आदर्शों की सिफारिश करती हैं. लेकिन व्यक्तिगत रूप में उन्हें इनमें से किसी भूमिका को निभाने का मौका नहीं मिला.
पुस्तक ‘मल्लिका का रचना-संसार’ के अनुसार, हरिश्चंद्र की कई साहित्यिक कृतियां मल्लिका के साथ लिखी गई हैं. कहा जाता है, कि दोनों एक ही उम्र के थे- जब हरिश्चंद्र 23 साल के थे, और कुछ लोगों के अनुसार 15 के, तभी से मल्लिका उनके संरक्षण में आई थीं. उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में हमारी जानकारी लगभग नगण्य है. वे संभवत: बाल-विधवा या परित्यक्ता थीं, जो शायद बनारस या शायद बंगाल में उनसे मिली थीं- जैसा कि प्रसिद्ध सौन्दर्यशास्त्री और कला आलोचक, भारतेन्दु के जीवन के अधिकारी विद्वान, रायकृष्ण दास (1976) मानते हैं. मल्लिका के उपन्यासों में से दूसरा उपन्यास बाल-विधवा के भाग्य की मार्मिक कथा कहता है. हो सकता है, विधवा जीवन की व्यथा की जानकारी उन्हें अपने जीवन से मिली हो. वे अपने साथ शिक्षा, संस्कृति और एक संस्कारी लेखनी लाई थीं.
हरिश्चंद्र के करीबी सहयोगी और फुफेरे भाई रायकृष्ण दास के अनुसार, हरिश्चंद्र ने अपने छोटे भाई गोकुलचंद्र को 1882 में लिखे एक पत्र में यह स्वीकार किया था कि उन्होंने मल्लिका को अपने जीवन में विधिपूर्वक अपनाया था. वे चंद्रिका के नाम से लिखती थीं, जो कि हरिश्चंद्र के नाम के आख़िरी हिस्से से ही व्युत्पन्न था. उनके नाम पर ही हरिश्चंद्र ने अपनी पहली पत्रिका का नाम हरिश्चंद्र मैगजीन से बदलकर ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ कर दिया था. लिहाज़ा, यह अनुमान लगाना शायद ग़लत न होगा कि वे इस उद्यम में, और साथ ही अनेक ऐसे उद्यमों में भारतेन्दु की सहयोगी थीं. भारतेन्दु की अनेक साहित्यिक रचनाओं में उनके नाम को लेकर शब्द-क्रीड़ा की गई है. अपनी कविताओं के संग्रह प्रेम तरंग (1877) में भारतेन्दु ने छियालीस बंगाली पदों को शामिल किया जो मल्लिका द्वारा रचे गए थे. ये प्रेम कविताएं हैं, जिनमें से कुछ कविताएं कृष्ण को संबोधित हैं और अक्सर रचनाकार के नाम के तौर पर इनमें ‘चंद्रिका’ का उल्लेख है, हालांकि कहीं-कहीं हरिश्चंद्र का नाम भी है.’
आपको बता दें, कि मल्लिका का अपना अपेक्षाकृत आश्रित जीवन 3 जनवरी, 1885 को हरिश्चंद्र के गुज़रने के साथ ही समाप्त हो गया. राधाकृष्ण दास की फरवरी 1885 की मासिक डायरी से मल्लिका के बारे में कुछ सूचनाएं भी मिलती हैं. इस डायरी में हरिश्चंद्र के छोटे भाई गोकुलचंद्र के एक पत्र की प्रतिलिपि भी है, जो उन्होंने हरिश्चंद्र की मृत्यु के दिन लिखी थी. हरिश्चंद्र ने अपनी वसीयत में कहा था कि माधवी (उनकी एक और रक्षिता) और मल्लिका को हरिश्चंद्र के हिस्से की संपत्ति बेचकर वित्तीय मदद की जाए. हालांकि गोकुलचंद्र ने माधवी के दावे को फालतू बताया था, क्योंकि वह एक वेश्या थी जिसके और भी ग्राहक थे. वे बताते हैं, कि हरिश्चंद्र को मल्लिका से ‘यथार्थ स्नेह’ था. हरिश्चंद्र उसे प्रति माह 21 रुपये दिए जाने का प्रावधान चाहते थे, जिसका पालन करने के लिए गोकुलचंद्र राज़ी थे, हालांकि यह सवाल अपनी जगह है कि यह भुगतान अगर किया भी गया तो कब तक उसका निर्वाह किया जा सका.
हरिश्चंद्र की मृत्यु से पहले मल्लिका ठठेर बाज़ार के भिखारीदास लेन में हरिश्चंद्र परिवार के मुख्य घर के दक्षिण में बने हुए एक घर में आराम से रहती थीं. वह घर हरिश्चंद्र के अपने भव्य भवन से एक पुल द्वारा जुड़ा हुआ था. हरिश्चंद्र की मृत्यु के समय वे उनकी मृत्यु-शय्या के पास मौजूद थीं और आगे के कुछ वर्ष बनारस में भी रहीं. लेकिन उसके बाद वह ओझल हो जाती हैं और यह संभव है कि उन्होंने जल्द ही लिखना छोड़ दिया होगा… मुमकिन है, उन्होंने हरिश्चंद्र के गुज़रने के बाद विधवा का जीवन जिया हो, और मुमकिन है, वे वृंदावन चली गई हों… जो कि परित्यक्ता और अभागी विधवाओं का अंतिम शरण माना जाता है. मल्लिका का अपना दुर्भाग्य संभवत: उसी व्यथा को प्रतिबिंबित करता है जिसका दर्दनाक चित्रण उन्होंने ‘सौन्दर्यमयी’ जैसों के सन्दर्भ में किया था.
यह सच है, कि मल्लिका अपने पीछे स्थायी महत्त्व की साहित्यिक थाती छोड़ गईं. उनकी मौलिकता का विस्तार या सीमाएं जो भी हों, वे निश्चित रूप से आधुनिक हिंदी की पहली स्त्री उपन्यासकार के सम्मान की हक़दार हैं और ऐसी पहली लेखिका होने के सम्मान की भी, जिन्होंने स्त्री के भाग्य को, उसके भावनात्मक अस्तित्व को, उसके नज़रिये को अपने लेखन का केंद्र बनाया और शायद ऐसी पहली लेखिका होने के सम्मान की भी, जिसने स्त्रियों के दुर्भाग्य के चित्रण में चुनौती और अवज्ञा का एक सुर जोड़ा.
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FIRST PUBLISHED : December 5, 2023, 15:40 IST





