शायर मजाज़ ने कहा था -जोश साहब घड़ी रख कर पीते हैं, मेरा बस चले तो घड़ा सामने रख कर पिया करूं

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हाइलाइट्स

मजाज़ को बड़ी ही शिद्दत से याद किया है जोश मलीहाबाद ने
नौजवान मजाज़ की शायरी के दीवाने थे
छोटी जिदगी मिली लेकिन उर्दू साहित्य को अनमोल खजाना दिया

बेहद अफसोस है कि मैं ये लिखने के लिए जिंदा हूं कि मज़ाज मर गया. यह कोई मुझसे पूछे कि मजाज़ क्या था और क्या हो सकता था. मरते वक्त तक उसका महज एक चौथाई दिमाग ही खुलने पाया था और उसका सारा कलाम उस एक चौथाई खुले दिमाग की खुलावट का करिश्मा है. अगर वह बुढ़ापे की उम्र तक आता तो अपने दौर का सबसे बड़ा शायर होता. शायर मजाज़ लखनवी को याद करते हुए जोश मलीहाबादी ने ये बातें लिखी हैं. निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि ये बातें बिल्कुल सही हैं.

मनमाने तरीके से जीने वाले इस मजाज़ शराब के बहुत शौकीन थे. कहा जाता है उनकी जिंदगी को छोटी करने की वजह भी यही थी. खुद जोश लिखते हैं -“एक रोज किसी अल्लाह के बंदे ने उनको समझाया कि देखो जोश साहब की तरह शराब की एक तय मिकदार को घड़ी सामने रख कर एक तय वक्त में पिया करो, तो उसने जबाव दिया था कि जोश साहब तो घड़ी सामने रख कर पीते हैं मेरा बस चले तो मैं घड़ा सामने रख कर पिया करूं.”

उर्दू साहित्य को बहुत ही छोटे वक्त में साहित्य का बहुत बड़ा खजाना देने वाले इस शायर की तुलना बहुत सारे लोग अंग्रेजी के रचनाकार जॉन कीट्स से करते हैं. 19 अक्टूबर 2011 को लखनऊ के पास रुदौली में पैदा इस शायर ने 5 दिसंबर 1955 को दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन जाने से पहले उन चुनिंदा रचनाकारों में शामिल हो गए जिनकी अपनी रचनाएं उनके रचनाकाल के बहुत शुरुआती दौर में ही कॉलेज यूनिवर्सिटी के कोर्स में पढ़ाई जाने लगी थी. उनके शेर इस कदर मकबूल हुए कि बहुत सारी लड़कियां उन्हें दिल ही दिल में मोहब्बत करने लगी थी. कहा जाता था कि वे एक ऐसे शायर थे जिनकी तसवीरें कॉलेज की लड़कियों के कमरों में होती थी. खास बात ये थी कि मजाज़ ही वे शायर हैं जिनकी रुमानियत की शायरी भी उतनी ही मकबूल है जितनी इंकलाब की. उनके शेर गवाही देते हैं कि मजाज़ की सोच असल में दौर से बहुत आगे थी.

हिजाब ऐ फ़ितनापरवर अब उठा लेती तो अच्छा था
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था.

ये तेरा जर्द रुख, ये खुश्क लब, ये वहम, ये वहशत
तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था.

तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था.

एक नौजवान खातून से नाम की रचना का आखिरी शेर आज तक किसी नारे से कम नहीं है. नारा भी इस कदर बुलंद और मौजूं कि इसका अर्थ जेहन में जोश भर देता है. महिला सशक्तीकरण के लिए इस शेर की कोई बराबरी नहीं है. यही मजाज जब रूमानियत पर लिखने आते हैं तो लिखते हैं –

हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछ

ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था

तेरे जल्वों में घिर गया आख़िर

ज़र्रे को आफ़्ताब होना था

कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी

कुछ मुझे भी ख़राब होना था

रात तारों का टूटना भी ‘मजाज़’

बाइस-ए-इज़्तिराब होना था.

ऐसा कुछ भी नहीं था जो उनकी नजर से गुजर जाए और मजाज उस पर कुछ सार्थक न कह दें.

वो एक नर्स थी चारागर जिसको कहिए
मदावाये दर्दे जिगर जिसको कहिए.

दौर में चल रही चर्चा पर जब मजाज लिखते हैं तो वो भी पढ़ते ही बनता है –

मेहनत से ये माना चूर हैं हम
आराम से कोसों दूर हैं हम
पर लड़ने पर मजबूर हैं हम
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम

मजाज की रचनाएं कुछ ऐसी है जिन्हें सुनना आज भी उतना ही पुरसुकून लगता है जितना वो लिखी जाते वक्त थी.

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

Tags: Literature, Poet

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