
राजकमल प्रकाशन से एक पुस्तक आई है- “मोहन राकेशः अधूरे रिश्तों की की पूरी दास्तान”. पुस्तक को लिखा है जयदेव तनेजा ने. जयदेव तनेजा ने यह पुस्तक मोहन राकेश के साहित्य (कुछ छपे, कुछ अधूरे), उनके पत्रों के अध्ययन, उनके सगे-संबंधियों, प्रकाशकों और मित्रों से बातचीत के आधार पर तैयार की है. नाटक, कहानी, प्रेम संबंध, पति-पत्नी संबंध (प्यार-खटास), संघर्ष आदि में इधर-उधर बिखरे पड़े मोहन राकेश को समेटकर जयदेव तनेजा ने अधूरे रिश्तों की पूरी दास्तान रची है.
पुस्तक में हमें मोहन राकेश के व्यक्तित्व और कृतित्व के कई आयाम देखने को मिलेंगे. पुस्तक की शुरूआत होती है मोहन राकेश के संबंधों से. इसमें उन्होंने मोहन राकेश के पहले प्रेम और शारीरिक संबंध के बारे में लिखा है. पुस्तक की भूमिका में जयदेव तनेजा मोहन राकेश के प्रेम संबंधों के बारे में कुछ इस प्रकार लिखते हैं- मोहन राकेश अपने आत्मानुभव के आधार पर बिलकुल सहज, सरल और स्वाभाविक शब्दों में बस, केवल इतना ही कहते हैं- ‘आओ, प्यार करें, बिना ये जाने कि प्यार क्या है?’ उनके लिए प्यार सीखने की नहीं, करने की कला है.
भूमिका में ही एक जगह पर जयदेव तनेजा लिखते हैं- “इस पुस्तक का विषय चूंकि राकेश के व्यक्तिगत जीवन में आनेवाली स्त्रियों से उनके आधे-अधूरे रिश्तों पर केंद्रित है. इसलिए बेहतर है कि पहले हम पति-पत्नी, स्त्री-पुरुष, नर-मादा के बीच बननेवाले प्रेम, मित्रता और शारीरिक संबंधों के संदर्भ में उनके आत्मानुभवों एवं विचारों की चर्चा कर लें.”
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प्रस्तावना में एक जगह लिखा हुआ है- अपनी जिस्मानी जरूरतों, इमोशनल भूख और घर की तलाश में राकेश आजीवन छटपटाते-भागते रहे. अपनी इस विवशता तथा अतृप्त लालसा का स्पष्ट उल्लेख वह अपनी डायरी में बार-बार करते हैं. उनके मित्र और संपादक राजेंद्र पाल के साथ एक इंटरव्यू में नितांत व्यक्तिगत प्रश्न के सवाल पर मोहन राकेश कहते हैं कि वह पत्नी के प्रति वफादार नहीं रहे थे क्योंकि- “मैं मानता हूं कि मुझे हर हालात में स्त्री का साथ चाहिए था, चाहे किसी भी तौर-तरीके से क्यों न हो और ये इंतजाम मैंने कर लिया था.”
पुस्तक में एक स्थान पर मोहन राकेश के पहले संबंध के बारे में लिखा गया है. “स्त्री-पुरुष संबंधों का वह पहला और अनोखा अनुभव” में बताया गया है कि किस प्रकार मोहन राकेश ने शिमला में एक अंजान महिला के साथ संबंध बनाए थे. आप भी पढ़ें यह संदर्भ-
स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का वह पहला और अनोखा अनुभव
शिमला 1950
बहुत अचानक हुआ. बस देखा, चाहा और सब हो गया. जिंदगी में पहली बार. उसे हैरानी हुई कि यह मेरी पहली बार है, शायद खुशी भी. उसने पता मांगा, तो सिगरेट की डब्बी फाड़कर उसे लिखकर दे दिया. पर असली पता नहीं. मार्फत…।
उसने अपना पता भी दिया. अलीगढ़ का. कहा कि वहां आऊं, तो किसी से भी वकील…का घर पूछ लूं. दस से पांच तक वह अक्सर घर में अकेली होती है, फिर उसने पहली बार डब्बी के कार्ड पर लिखा मेरा नाम पढ़ा. काम पूछा. उससे इतना ही कहा कि यहां नौकरी के इंटरव्यू के लिए आया हूं.
‘आप कल शाम ही आए हैं,’ वह बोली. ‘हम लोग दो दिन से यहां थे.’ अफसोस मुझे भी हो रहा था कि मैं कल शाम को ही क्यों आया? उन्हें आज दोपहर को ही क्यों चले जाना है?
‘कहीं चलकर चाय पीते हैं,’ उसने कहा. ‘इन्हें अभी एक-आध घंटा और लगेगा हाईकोर्ट में. कह रहे थे, बारह से पहले नहीं लौट पाएंगे.’ पर मना कर दिया कि चाय-वाय जैसी बेकार चीजें पहले के लिए ठीक हैं. अब सब हो चुकने के बाद क्या करना है चाय पीकर? और चाय पीने बैठेंगे, तो बात करनी होगी. क्या बात करेंगे? कहा, ‘नहीं, मैं सीधे होटल के कमरे में जाऊंगा. वहां किसी को वक्त दे रखा है.’ वक्त दे भी रखा था वाकई. हरिमोहन को. इसलिए अपने सफेद पुलोवर की बांहों को देख रहा था, जो सुरंग की कालिख से स्याह हो गई थीं. सोच रहा था कि हरिमोहन देखकर पूछेगा, तो…? वह हरगिज नहीं मानेगा कि यह मेरी पहली बार थी.
‘ड्राई-क्लीन कराना पड़ेगा,’ वह हँसी.
‘इसी समय पहने-पहने तो ड्राई-क्लीन हो नहीं सकता,’ मैं खीझ के साथ बुदबुदाया. सोचा कि उसे तो पता होगा पहले से सुरंग की कालिख का. जब उसे सुरंग का पता था कि दिन के दस बजे वहां आउट-डोर में यह हो सकता है, तो और सब भी पता होगा. तो क्या दो दिन में भी वह एक से ज्यादा बार वहां आ चुकी थी? उसने कहा था कि वे लोग शिमला पहली बार आए हैं.

‘आप चले जाइए शॉर्ट-कट से. हम बाद में सड़क से घूमकर आएंगे,’ वह बोली. शॉर्ट-कट के पास अलग होने के साथ ही हम पहले की तरह अजनबी हो गए. जैसे उस समय थे जब होटल से निकले थे. अलग-अलग और दस मिनट के फर्क़ से.
पगडंडी से हिन्दू लॉज की तरफ चढ़ते हुए सोच रहा था कि आसान शायद यही होता है-एक अजनबी का अजनबी के साथ. कल शाम को सिर्फ देखा भर. सुबह दो-चार मिनट बात हुई. बालकनी पर, मौसम के बारे में. फिर कमरे के सामने से गुजरते हुए एक मुस्कुराहट और सवाल, ‘घूमने चलिएगा? हमारे ये तो हाईकोर्ट गए हैं. हम सोच रहे हैं, दो घंटे कहीं घूम आएं. हम चल रहे हैं माल पर. आप आ जाइए दस मिनट में, आना हो तो.’ और बस.
पगडंडी पर चढ़ते हुए कुछ छोटी-छोटी टहनियां तोड़ लीं. टूट-टूटकर इतनी छोटी हो गई कि और नहीं तोड़ी जा सकीं, तो फेंक दीं. इससे पहले कितनी बार चाहता था कि यह हो सके-कितनी-कितनी मंजिलें तय की थीं इसके लिए. योजनाएं और भूमिकाएं. नतीजा कुछ नहीं. क्योंकि परिचय से एक दीवार उठ आती थी. ‘परवाह’ हो जाती थी. ‘जानने’ की कुंठा.
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माल पर आकर होटल में उतरने से पहले कुछ देर ‘पुरुष’ के अन्दर रुका रहा. अपने को देखता रहा कि क्या कुछ फर्क पड़ा है? और क्या बस यही होता है- इतना ही?
होटल के लकड़ी के जीने पर आकर फिर एक बार रुक गया. हरिमोहन आ चुका था. अपने पुलोवर की बांहों को एक नजर देख लिया. लगा कि उसके अलावा भी शायद पता चलने को बहुत कुछ है. साँस में बसी सुरंग के रिसते पानी की गन्ध. आंखों में भरी गोलाइयां जिन्हें पहली बार इतना नंगा और भरपूर देखा था-और किसी भी क्षण गाड़ी के सुरंग में आ जाने का डर.
इस अनुभव को अनोखा कहने-मानने के कई कारण हैं :
1. राकेश मानते रहे हैं कि बिना प्रेम और आत्मीय रिश्तों के स्त्री-पुरुष का ऐसा संसर्ग विशुद्ध पाशविकता है. यह संबंध इसलिए भी अनोखा है कि न तो यह बलात्कार है और न ही वेश्यागमन. वे पति-पत्नी संबंधों से तो भिन्न है ही, पत्नी की अनिच्छा के बावजूद पति द्वारा अपने सामाजिक-धार्मिक अधिकार के मद में बलात् पत्नी से किए गए सम्भोग से भी भिन्न है.
यह दो अपरिचितों के बीच परस्पर मर्जी से स्थापित किया गया स्वैच्छिक यौनाचार है. राकेश के सम्पूर्ण साहित्य में स्त्री-पुरुष-सम्बन्धों के इस रूप का चित्रण भी कहीं नहीं मिलता.
2. होटल में लौटने से पहले राकेश का ‘पुरुष’ शौचालय के शीशे में अपने-आपको इसलिए गौर से देखना कि इससे उसके चेहरे पर कुछ फर्क पड़ा है या नहीं? इसके अतिरिक्त उसका यह सोचना कि उसकी साँस में बसी सुरंग के रिसते पानी की गन्ध या आंखों में भरा स्त्री की नंगी देह पर उसकी भरी गोलाइयों का अक्स उसके इस गोपन क्रिया-कलाप की गवाही तो नहीं दे देंगे? स्त्री हो या पुरुष, कौमार्य-भंग के बाद इस प्रकार के संशयात्मक विचारों का आना आधुनिक मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से पूरी तरह स्वाभाविक और संगत है.
3 . किसी भी क्षण गाड़ी के सुरंग में आ जाने के मृत्यु-भय के बीच क्या सेक्स और उससे प्राप्त होनेवाली आनन्दानुभूति सम्भव है?-ऐसे अस्तित्ववादी गम्भीर प्रश्न का सामना भी यहां राकेश प्रत्यक्षतः करते हैं.
यहां यह तथ्य भी ध्यान देने लायक है कि राकेश अपने अन्तिम और अधूरे रह गए नाटक ‘पैर तले की जमीन’ में मानव-अस्तित्व के जिस बुनियादी और महत्वपूर्ण प्रश्न का रचनात्मक उत्तर तलाशने का प्रयत्न कर रहे थे- सम्भवतः उसके मूल में पहलगाम में पुल टूटने से आई बाढ़ में क्लब के डूबने से उत्पन्न आसन्न मृत्यु की घटना के साथ-साथ शिमला की इस रोमांचक घटना की स्मृति की भी कुछ भूमिका रही होगी!
बहरहाल, बहुत ज्यादा आर्थिक तंगी और पारिवारिक (मां, बहन, भाई) जिम्मेदारियों की मजबूरी के कारण बहुत भाग-दौड़ करके राकेश ने शिमला के जिस मिशनरी स्कूल में बड़ी मुश्किल से नौकरी पाई थी, अपनी बेचैन और बेसब्र मानसिकता के चलते वह उस रुटीन एकरस जिन्दगी से जल्दी ही उकता गए. 1950 के उस आरम्भिक दौर में दिन-रात अपने मन में उठनेवाले ज्वार-भाटा को राकेश ने इन शब्दों में व्यक्त किया है :
बहुत कोफ़्त होती है इस जिन्दगी में. सुबह उठते ही पहला खयाल कि गिरजे की घंटियां बजने में कितना वक्त है. कभी बीस मिनट मिलते हैं, कभी तीस मिनट. उतने में ही नहाना, खाना, तैयार होना होता है. प्रभु ईसा को कभी नौकरी नहीं करनी पड़ी, वरना सारा टेस्टामेंट ही बदल गया होता. खास तौर से अगर नौकरी मिशनरी स्कूल की होती. मिस्टर फिशर जैसे हेडमास्टर से पाला पड़ा होता. ‘दि ग्रोटो’ इस कोठी का नाम है जो हमें स्कूल से मिली हुई है. ईसा मसीह के जन्म-स्थान के नाम पर. क्या ईसा मसीह को भी उस तबेले में वैसी ही उलझन होती रही होगी, जैसी मुझे यहां होती है?
सुबह उठते ही बेड-टी का बटन ऑन. पानी जरा-सा गर्म होते ही शेव, टॉयलेट और सूट-बूट. काला चोगा. चलते-चलते चाय की प्याली. स्कूल के आधे रास्ते में डिंग-डांग, डिंग-डांग. वक्त पर गिरजे में पहुंचने के लिए दौड़. हाँफते हुए मास्टरों की लाइन में शामिल. दूसरी लाइन में तीसरी सीट. ‘अवर फ़ादर, हू आर्ट इन हैवन, हैलोड बी दाई नेम…’ एक-एक करके सात पीरियड. पढ़ा सकते थे ईसा मसीह इतने पीरियड? इससे कहीं आसान था क्रॉस कन्धे पर लेकर चलना.
वही रोज की जिन्दगी-अनचाही. अनमने ढंग से किया काम. फुसफुसी फुलझड़ियों जैसी बातें ‘हऊ फ़ाइन!,’ ‘हऊ नाइस!,’ ‘डिड यू गो टु द माल येस्टरडे?, ‘हऊ इज द लिवर?, ‘हऊ मैनी पीरियड्स मोर?’
ऑक्स फॉर सेल-कैन ऊ सैवन पीरियड्स ए डे?
वही सब जो कल हुआ था, आज भी हुआ और कल भी होगा. एक लम्बे सिलसिले की एक-सी कड़ियां, एक-से ढंग से रोज-रोज जोड़ते जाना. ऐसा कुछ नहीं, जो इस सिलसिले से बाहर या हटकर हो. सीधी-सीधी कड़ियां और ढीली-ढीली गाँठें. जैसे यह जिन्दगी नहीं, फकत एक जिंदगीनुमा खेला है. हम सब ईसा मसीह के बच्चे रोज यह खेल खेलते हैं. ‘अवर फ़ादर, हू आर्ट इन हैवन…’
दिन बीतने तक एक थकान. होने की नहीं, न होने की. क्यों आज का दिन कल के दिन में ऐसा नहीं उलझ जाता कि सचमुच होने का एहसास हो? गाँठें कुछ इस तरह उलझ जाएं कि उन्हें सुलझाने-सुलझाने में उंगलियों के पोर टूटने लगे? अपना आप उन गाँठों में इस तरह कसा लगे कि एक-एक दिन उन्हें खोलने या तोड़ने के हताश संघर्ष में बीते? लगे कि होने की वास्तविकता यह है. मैं यह हूं जो सुबह से शाम के बीच इतना दुखता हूं, इतना छटपटाता हूं. यह नहीं जो दो स्लाइसों के साथ दो अंडों की जर्दी निगलकर चॉक से ब्लैकबोर्ड पर लकीरें खींचता हूं. ‘हऊ आर यू टुडे?, ‘क्वाइट वेल, थैंक यू’ वाला मैं नहीं, ‘डैम यू, यू राटन स्वाइंज! डैम यू, यू स्टिकिंग बिचिज’ वाला मैं. पर वह मैं कहां हूं?
कितने-कितने रास्ते हैं, जिन पर चल पड़ने को मन करता है. उनसे आगे भी कितने रास्ते हैं, जिनके मोड़ तक भी कभी नहीं पहुंचेंगे. सड़कों, पटरियों और पगडंडियों की शक्ल में कितना बड़ा गुंझल है रास्तों का. उस गुंझल में पहाड़ और समुद्र, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव, सभी-सभी एक-दूसरे से मिले हुए हैं. यहां का स्कैंडल पाइंट न जाने कहां की अबरक की खानों से, यह घर ‘दि ग्रोटो,’ न जाने कहां के ‘विला मैरीना’ या ‘विला पैरेडाइज’ से. सब एक-दूसरे से मिले होने पर भी उस गुंजल में खोए हुए उसके इस सिरे से उस सिरे तक का तार निकाल लेने में असमर्थ.
कैसे हो सकता है कि, चाहे एक क्षण के लिए ही, आदमी सब रास्तों को एक साथ एक नजर से देख सके? धुंध मे लिपटे इस सारे भूलभुलैया का एक क्षणिक- सा ग्राफ हासिल कर सके? जिन्दगी भर ‘दि ग्रोटो’ के लॉन में ही चहलकदमी न करता रहकर हर ‘विला मैरीना’ और हर ‘विला पैरेडाइज़’ को भी, चाहे आंख से ही, एक-एक बार छू सके?
रात. खिड़की के बाहर सरसराते देवदार और अंधेरा. कुछ आवाजें. चिचियाते कीड़ों की. एक भौंकते कुत्ते की. हवा. दूर एक धुंधली-सी रेखा सामने की पहाड़ी के ‘वी’ कट की.
हवा में कुछ सिहर रहा है. अंधेरे में भी. मेरे अन्दर में भी. जैसे अभी-अभी कुछ होने को है. हवा, अंधेरा और मैं- सब उसके होने की प्रतीक्षा में हैं. हर क्षण सोच रहे हैं कि बस, अब अगले ही क्षण से वह होना शुरू होगा. इससे अगले क्षण से. और मोहन राकेश के जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना या त्रासदी यही है कि जिस आनेवाले क्षण अथवा कल की आतुर प्रतीक्षा वह ताज़िन्दगी करते रहे, वह कल कभी नहीं आया.
पुस्तकः मोहन राकेश: अधूरे रिश्तों की पूरी दास्तान
लेखकः जयदेव तनेजा
प्रकाशकः राधाकृष्ण पेपरबैक
मूल्यः 499 रुपये
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Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : December 4, 2023, 15:10 IST





