वोट देने से पहले क्या सोचता है मतदाता, किन बातों के आधार पर लेता है फैसला

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हाइलाइट्स

वोट देने से पहले आखिर एक वोटर क्या सोचता है, वोट देने से कितने पहले वो मन बना लेता है
अमेरिका और यूरोप में वोट डालते समय वोटर जरूर सोचता है कि कौन सी पार्टी उसकी आर्थिक बेहतरी करेगी

नवंबर में देश के 05 राज्यों में विधानसभा चुनावों में कई चरणों में मतदान हुआ. ये राज्य थे मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम. इन पांचों राज्यों के नतीजे अब आ चुके हैं. इसमें उत्तर भारत के तीनों राज्यों में बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की तो मिजोरम में क्षेत्रीय पार्टियों का एक गठबंधन जेडपीएम (Zoram People’s Movement) ने जीत पाई. इन सारे चुनावों में वोट देने वालों ने मतदाताओं ने अलग राज्यों में अलग तरीके से बिहेव किया. वोट देने से पहले उनके फैसला करने के तरीके भी अलग थे.

आखिर वोट देने से पहले मतदाता क्या सोचता है. किन खूबियों को ध्यान में रखकर वो किसी को वोट देने जाता है. किसको वोट देना है, इसका फैसला वो कब कर लेता है. इस संबंध में पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी, जिसे जानकर हम भारतीय मतदाताओं के वोटिंग बिहेवियर यानि वोट डालने के व्यवहार को जान सकते हैं.

वोटिंग व्यवहार यानि वोटर्स का मनोविज्ञान ये बताता है कि वोटर्स कैसे अपना फैसला करता है, वोट देने के दौरान उसके दिलोदिमाग में क्या होता है, जिसके आधार पर वो ये फैसला करता है कि किसे वोट देना है.

जहां तक भारत की बात है तो देश का एक आम वोटर जब वोट देने जाता है तो उस पर कई फैक्टर काम कर रहे होते हैं, जिसमें जाति, धर्म, समुदाय, फायदे वाली घोषणाएं, योजनाएं, पैसा, भाषा और प्रत्याशी सभी कुछ होते हैं. अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को बनाने में वो इन सभी का सहारा लेता है. मीडिया रिपोर्ट्स भी किसी हद तक उस पर असर डालती हैं.

हर देश के वोटर्स का मनोविज्ञान अलग होता है

हर देश में वोटर्स का वोट मनोविज्ञान एकदम अलग होता है. मसलन अमेरिका और यूरोप में वोट डालते समय वोटर ये जरूर सोचता है कि किस पार्टी के सरकार बनने पर उसकी आर्थिक बेहतरी हो पाएगी. वहीं जापान में शहरी लोग आमतौर पर सोशलिस्ट पार्टियों के समर्थक होते हैं तो ग्रामीण आबादी कंजरवेटिव पार्टियों के समर्थक होती आई है. कई बार भावनाओं और वोटों का सीधा रिश्ता होता है.

क्या कहती है रिपोर्ट 
कारनेगी की रिपोर्ट “अंडरस्टैंडिंग इंडियन वोटर्स” इसकी तह तक जाने की कोशिश करती है. मिलान वैष्णव की इस रिपोर्ट की कुछ खास बातें ये हैं
– देश में वोटर राष्ट्रीय पार्टियों के साथ क्षेत्रीय दलों के बीच पर्याप्त संतुलन रखता है
– डायनेस्टी पॉलिटिक्स बेशक लोकप्रिय नहीं हो लेकिन डायनेस्टी लीडर्स जरूर लोकप्रिय हैं
– अपराधियों को चुनने में भारतीय वोटर्स को आमतौर पर कोई गुरेज नहीं होता
– वो वोटिंग करते समय दिमाग में जाति, धर्म, धन, फायदा, समुदाय, प्रत्याशियों से रिश्ते कई बातों का ध्यान रखते हैं
– हालांकि हाल के बरसों में भारतीय वोटरों का वोटिंग बिहेवियर बदला है
– हालांकि भारतीय वोटर शायद ही कभी अच्छी अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर वोटिंग करता है.

क्या हैं भारतीय वोटर्स के आधार फैक्टर
– जाति : ये तो जगजाहिर है कि भारतीय वोटर्स जाति को लेकर एक खास आग्रह तो रखते हैं. इसी वजह से जहां कहीं चुनाव होते हैं, वहां पार्टियां इस आधार पर भी उम्मीदवार तय करती हैं कि उस इलाके में किस जाति के कितने वोट हैं. चुनाव विश्लेषकों के लिए इस आधार पर विश्लेषण बहुत सामान्य बात है.
– धर्म : ये भी हाल के बरसों में एक फैक्टर बन चुका है लेकिन धर्म की बात काफी हद तक उम्मीदवार किस पार्टी से खड़ा है, इस पर निर्भर करता है. हां ये तो होता ही कि इलाके में धार्मिक जनसंख्या को देखकर भी पार्टियां उम्मीदवार तय करती हैं. उनके दिमाग में यही होता है कि वोटर इस आधार को भी अपने जेहन में रखते हैं.
– प्रत्याशी कितनी मदद करता है : भारत जैसे देश में प्रत्याशियों की जनता के बीच छवि, उसका लोगों से रिश्ता उसके लिए खास मदद का काम करते हैं.
– धन : चुनावों में धन का प्रोलोभन एक कारक है. अब इसका स्वरूप बदलकर ये हो रहा है कि कौन सी पार्टी ऐसी घोषणा कर रही है, जिससे मतदाता का आर्थक तौर पर फायदा हो सकता है. कौन ऐसी योजनाएं हैं, जिसके लिए उसे मदद मिलेगी.
– समुदाय : निश्चित तौर पर जाति की तरह पंथ, संप्रदाय और समुदाय भी वोटों को प्रभावित करते हैं.
– पारिवारिक मान्यता : भारतीय मतदाताओं में एक परिवार की मान्यता किसी खास पार्टी और प्रत्याशी के प्रति देखी गई है
– भाषा और सिद्धांत: भाषा और कुछ हद तक सिद्धांत या उसूल भी वोटों की वजह बनते हैं. आमतौर पर पढ़े लिखे लोग इस ओर भी ध्यान देते हैं.

अमेरिका और यूरोप में क्या होता है
– अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में वोटर वोट देने से पहले एक बार ये जरूर सोचता है कि आने वाली सरकार आर्थिक तौर पर उसके लिए कितनी मददगार होगी. ये वहां की सरकारों की लोकप्रियता की पहली शर्त होती है लेकिन भारत में वोटर्स के दिमाग में शायद ही ये बात प्राथमिकता में होती है. भारत में इकोनॉमिक्स और चुनाव के बीच संबंध कम है. हालांकि पिछले कुछ चुनावों में ये बात भारत में भी देखी जाने लगी है कि मतदाता अब सोचने लगा कि किस सरकार की कौन सी घोषणाएं और योजनाएं उसके लिए आर्थिकतौर पर फायदेमंद हो सकती हैं.

मीडिया कितना असर डालता है
कारनेगी की रिपोर्ट कहती है कि वोटर का सामाजिक वातावरण मीडिया की बजाए उसके वोटों के तरीके को ज्यादा प्रभावित करता है.

एक चुनाव प्रत्याशी में क्या देखता है वोटर
राजनीतिक शास्त्री और विशेषज्ञ बी हजारिका अपने लेख फैक्शनालिज्म इन पॉलिटिक्स, द स्टेटस ऑफ कैंडीडेट्स में कई वो बातें गिनाते हैं, जो एक वोटर वोट देने से पहले अपने प्रत्याशी में देखता है.

करिश्मा-नेता कितना अट्रैक्टिव है, उसकी पर्सनालिटी में कितना चार्म है, वो नेता उसका प्रत्याशी भी होता है और पार्टी से जुड़ा सबसे बड़ा नेता भी. जिस तरह आजकल ज्यादातर वोटर बीजेपी से ज्यादा नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट देते हैं.

जाति- भारतीय समाज में जाति की जड़ें गहरे तक जुड़ी हैं. वो लंबे समय से सामाजिक रिश्तों का ताना-बाना रही हैं. खासकर ग्रामीण भारत में वोटर ये जरूर देखता है कि उसका वोट किस जाति के उम्मीदवार को जा रहा है. अगर वोटर उसकी जाति का होता है तो ज्यादा संभावना रहती है कि वो उसको वोट दे.

धर्म- बेशक कानूनी बाध्यातओं के चलते देश में सियासी पार्टियां धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगतीं लेकिन सांकेतिक तौर पर वो इनका खूब सहारा लेती हैं. इसीलिए भारतीय वोटर आमतौर पर वोटबैंक के रूप में देखा जाता है और सियासी दलों पर इनके संतुष्टिकरण का भी आरोप लगता रहा है. इसका भी गहरा असर वोटर्स की चेतना पर होता है.

भाषा- दक्षिण भारत के राज्यों में वोटर्स के लिए भाषा उनकी गरिमा और अस्मिता की वजह बनती है. हाल ही में कर्नाटक के चुनावों में बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने वोटरों के साथ खास कनेक्शन बनाने के लिए कन्नड़ भाषा का सहारा लिया और कन्नड़ नायकों के साथ चुनाव अभियान को जोड़ा गया.

धन- ये भी बहुत बड़ा फैक्टर है, जो गरीब वोटर्स के मनोविज्ञान पर खासा असर डालता है. हर चुनावों में बड़े पैमाने पर धन पकड़ा जाता है. कर्नाटक चुनावों के दौरान करीब 120 करोड़ रुपए के नोट जब्त किए गए.

प्रत्याशी की उपलब्धता- जनप्रतिनिधि की उपलब्धता और उसके काम कराने की क्षमता उसे वोटरों से काफी हद तक जोड़ती है. जिन स्थानों में चुनाव जीतते ही नेताओं ने जनता से दूरी बना ली या वो जनता के काम नहीं करा पाए, वहां उनकी छवि पर काफी नकारात्मक असर पड़ा. वोटर ने उनको लेकर नकारने का मन बना लिया.

सरकार का प्रदर्शन – ये सबसे नीचे होता है, हालांकि एंटी एंकंबेंसी फैक्टर को लेकर सरकारों को जनता खारिज करती रही है. ये इस पर भी निर्भर करता है कि सरकार के काम करने को लेकर दूसरे सियासी कैसा माहौल बना रहे हैं या मीडिया के जरिए उनका कैसा परसेप्शन बन रहा है.

हालांकि शिक्षित युवाओं के बीच ये रुझान बदल रहा है. वो सरकार के कामकाज और पार्टी की प्राथमिकताओं को देखकर वोट देते हैं

कितने समय पहले मन बना लेता है
एक और रिपोर्ट कहती है कि भारतीय मतदाता जब मतदान केंद्र पर वोट देने पहुंचता है तो ईवीएम पर बटन दबाने से पहले ही फैसला करके आता है कि उसको किसे वोट देना है. ओपिनियन पोल से लेकर  एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां भी अपनी रिपोर्ट्स में जाहिर कर चुकी हैं कि भारतीय वोटर पहले से तय कर चुके होते हैं कि उनका वोट किधर जाना है.

ये रिपोर्ट्स भी
हमारे यहां ये भी रिपोर्ट्स आती हैं कि ग्रामीण महिलाओं से जब पूछा गया कि उन्होंने वोट देना कैसे तय किया तो उनका जवाब था कि परिवार के पुरुषों ने उनसे जो कहा, उन्होंने उसी को वोट दे दिया.

हालिया बदलाव
05 राज्यों के इन विधानसभा चुनावों में ये बात भी सामने आई कि जनता ने सरकार की उन नीतियों और योजनाओं या पार्टियों की उन घोषणाओं पर गौर किया, जो आर्थिक तौर पर उनके लिए फायदेमंद हैं. पिछले कुछ बरसों में भारतीय वोटर को लोकलुभावन आर्थिक हितों से जुड़े वायदे भाने लगते हैं.

Tags: Dalit voters par focus, Muslim Voters, Voter ID, Voter List

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