
देश के प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने आज से करीब 70 वर्ष पहले दिलीप कुमार के साथ “फुटपाथ” फिल्म में काम किया था और वह चाहते तो सिनेमा में ही अपना करियर बनाते लेकिन, रंगकर्म से उन्हें इतना प्यार था कि उन्होंने नाटकों में ही अपना जीवन लगा दिया. यह वर्ष हबीब तनवीर की जन्मशती के रूप में मनाया जा रहा है.
हबीब तनवीर की जन्मशती पर रज़ा फाउंडेशन की ओर से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ‘हबीब महिमा’ का आयोजन किया गया. इस मौके पर किसी ने उन्हें जीनियस बताया तो किसी ने जादूगर. कोई उन्हें बीसवीं सदी का सबसे बड़ा “संस्कृति पुरुष” बता रहा था कोई तनवीर को क्रांतिकारी तथा लोक और शास्त्र का समन्वयक बता रहा था. अशोक बाजपेई, असगर वजाहत, एमके रैना, कीर्ति जैन, सुधन्वा देशपांडे, महमूद फारुकी, अरविंद गौड़, रवींद्र त्रिपाठी, भरत शर्मा ने हबीब साहब पर अपने विचार व्यक्त किए और संस्मरण सुनाए.
अशोक वाजपेई ने कहा कि हबीब तनवीर 20वीं सदी के सबसे बड़े संस्कृति पुरुष थे जिन्होंने वैकल्पिक आधुनिकता प्रदान की. उन्होंने परंपरा में हस्तक्षेप नहीं किया बल्कि परंपरा का विस्तार किया. उस समय की जो आधुनिकता थी उससे हटकर उन्होंने शास्त्र और लोक के बीच रिश्ता बनाते हुए एक नई आधुनिकता पैदा की.
अशोक वाजपेई बताते हैं कि हबीब तनवीर ने मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, गिरीश कर्नाड आदि के नाटक नहीं किये और ना ही शेक्सपियर के नाटक किए बल्कि उन्होंने अलिखित नाटक किया. और उन्होंने नाटक किया ही नहीं बल्कि खेला भी. हबीब तनवीर के नाटकों में खेलने का भाव अधिक है. वे नाटक नहीं करते थे बल्कि खेला करते थे और उसमें क्रीड़ा भाव अधिक था. ‘चरण दास चोर’ में इतनी भागदौड़, इतनी उछलकूद इसका उदाहरण है.
अशोक वाजपेई कहते हैं कि हबीब तनवीर का रंगमंच प्रश्नवाचक रंगमंच था. उसमें एक लीला का विभव था. उनके नाटकों को देखकर मुझे बचपन की रामलीला भी याद आई थी. उनके नाटकों के दर्शकों में कुमार गंधर्व जैसे लोग भी होते थे.
अशोक वाजपेयी पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं- “मुझे याद है कि एक बार इंदौर में हबीब तनवीर का नाटक देखते हुए कुमार गंधर्व अचानक उछल पड़े और फिदा बाई को सुनते हुए कहा- क्या मारा है. मैंने सोचा आखिर क्या बात हुई यह किसके लिए ऐसा कर रहे हैं तो पता चला कि उन्होंने नाटक के गाने को सुनते हुए कहा कि क्या सुर मारा है.”
प्रसिद्ध रंगकर्मी सुधन्वा देशपांडे ने कहा कि हबीब तनवीर एक जीनियस रंगकर्मी थे और उन्होंने दिलीप कुमार जैसे अभिनेताओं के साथ फिल्मों में काम किया था. वह चाहते थे तो फिल्म में ही अपनी संभावना तलाश सकते थे लेकिन उन्होंने रंगकर्म को अपना रास्ता बनाया. क्योंकि उन्हें समाज में कुछ कहना था. हबीब साहब कहते भी थे कि नाटक करना उनका धर्म है. और उन्होंने इस धर्म को मरने तक निभाया.
सुधन्वा देशपांडे ने सफदर हाशमी के साथ हबीब साहब के संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि जब सफदर हाशमी पर जानलेवा हमला हुआ था तो हबीब तनवीर काफी बेचैन थे और गुस्से में थे. इससे पहले कभी भी उनको इतना तिल मिलाते हुए नहीं देखा था.
उन्होंने कहा कि हबीब तनवीर राजसभा के सदस्य थे और उस समय देश में इमरजेंसी लगी थी. लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि हबीब तनवीर ने इमरजेंसी का विरोध नहीं किया. पर उन्हें अपने रंगकर्मियों की टीम की अधिक चिंता थी और रंगमंच को जीवित रखना था शायद यह कारण रहा हो कि वह इस्तीफा नहीं दे सके.
एनएसडी की पूर्व निदेशक कीर्ति जैन ने कहा कि शंभू मित्र, शांत गांधी, तनवीर साहब और दीना पाठक ये ऐसे रंगकर्मी थे जिनमें बहुत हद तक समानताएं थीं लेकिन उनके रास्ते अलग-अलग थे. वे सभी इप्टा से निकले थे. उन्होंने फिल्मों का रास्ता छोड़कर तय किया था कि उन्हें कुछ कहना है.
असगर वजाहत ने अपने चर्चित नाटक “जिसने लाहौर नहीं देख्या वो जन्मा ही नहीं” के मंचन का जिक्र करते हुए कहा कि हबीब साहब कराची में उस नाटक का मंचन करना चाहते थे लेकिन पाकिस्तान पुलिस ने उन्हें अनुमति नहीं दी. पुलिस ने तीन कारणों से नाटक को करने की अनुमति नहीं दी. पहला कारण तो यह था कि नाटककार पाकिस्तान का नहीं है. दूसरा कारण यह था कि इसमें मौलवी की हत्या दिखाई गई है जो कि इस्लाम की हत्या है. तीसरा कारण यह था इस नाटक में जो हिंदू बुढ़िया दिखाई गई है वह बहुत नेक हिंदू है और इतना नेक कोई हिंदू हो नहीं सकता है. बाद में वह नाटक जर्मन गोए थे.
असगर वजाहत ने हबीब तनवीर को नाटकों का जादूगर बताते हुए जामिया मिलिया से उनके रिश्तों का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह हबीब साहब ने ‘आगरा बाजार’ जब जामिया में किया तो खपरैल के मकान में रिहर्सल किया करते थे. ‘आगरा बाजार’ में जामिया के टीचरों ने भी भूमिका निभाई थी.
प्रसिद्ध रंगकर्मी एमके रैना ने हबीब साहब को जीनियस बताते हुए कहा कि हबीब तनवीर ने केवल नाटक ही नहीं किया बल्कि समाज में चल रहे विभिन्न आंदोलनों में भी भाग लिया. चाहे वह साक्षरता आंदोलन हो, विज्ञान आंदोलन या फिर आदिवासियों का आंदोलन. उन्होंने अपने समय की राजनीति में भी वैचारिक हस्तक्षेप किया.
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Tags: Hindi Literature, Literature and Art
FIRST PUBLISHED : December 3, 2023, 16:28 IST





