
जापान में लोगों के नाम के पीछे ‘मिकोतो’ यानी ‘प्राण’ लिखे जाने की परंपरा है. माना जाता है कि सभी लोगों के प्राण ईश्वर के प्राणों का भाग हैं, इसलिए इनोची-मिकोतो लिखकर ‘अमुक मिकोतो’ पुकारा जाता है. इस प्रकार सृष्टा के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट किया जाता है. इसका एक और लाभ यह है कि मनुष्य यह कल्पना करके आनंदपूर्वक रहता है कि अनंत दयासागर सृष्टा उसकी रक्षा कर रहा है. जापान की यह प्राचीन संस्कृति किस्सों-कहानियों के द्वारा युगों-युगों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती चली आ रही है.
जापानी कहानियां आश्चर्य, रहस्य, वैचित्र्य, वीरता जैसे दिलचस्प भावों से ठीक उसी तरह भरी हुई हैं, जैसी कि वहां कि फिल्में. वहां की कहानियों में मानव-मन की जिज्ञासा गजब-गजब तरह के खेल करती हुई दिखाई देती है. आकाश, वायु, वृक्ष, कीड़े-मकोड़े कैसे उत्पन्न हुए? मानव कब जन्मा? सूर्य कहां से आया? उसे किसने बनाया? वह हर दिन प्रकाशित होता है, लेकिन न तो उसकी रोशनी घटती है और न ही उसका ताप… उसे इतनी शक्ति किसने दी? या फिर, मनुष्य किसकी शक्ति से जीवित रहता है? इसी प्रकार के अनगिनत सवालों के जवाब जापानी पौराणिक साहित्य में मिलते हैं.
जापानी भाषा में अनेक प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं. इनमें प्रतीकात्मक शैली में बहुत-सी जानकारियां हैं. इस प्रकार वहां का सबसे पुराना ग्रंथ है ‘कोजिकी’, जिसमें प्राप्त प्राचीन कहानियों को 1286 वर्ष पूर्व गेंमेइ सम्राट के काल में ओहोनोया सुमारो ने हिएदानोअरे की बोली के रूप में लिपिबद्ध किया था. इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ में जापान के जन्म की कथा भी है. पढ़ें ऐसी ही एक दिलचस्प जापानी कहानी ‘यामाता का भयानक सांप’…
यामाता का भयानक सांप : साइजी माकिनो
सुसानोओ, ताकाआमाहारा से निर्वासित होकर इजुमो नामक देश की हिइया नदी के उद्गम पर स्थित तोरिकामी नामक पहाड़ पर उतरा. उसने चारों ओर देखा और आश्चर्य में भरकर सोचा, ‘यह मैं कहां आ पहुंचा?’
थोड़ा आश्वस्त होने के बाद वह मन ही मन कहने लगा, “मैंने ताकाआमाहारा में बहुत उत्पात मचाया था. आमातेरासु महादेवी की तेजस्वी पवित्र आत्मा के कारण ही मेरी रक्षा हुई और मैं जीवित इस स्थान तक आ सका. अब मेरा कर्तव्य है कि मैं यहां के लोगों के बीच आमातेरासु के आदर्शों और यश का प्रचार करूं.”
किन्तु यहां आस-पास कोई आदमी दिखाई नहीं पड़ रहा था. सुसानोओ चिन्ता में पड़ गया कि इस निर्जन में वह अपना कार्य कैसे करेगा ? उसी समय उसकी दृष्टि नदी की धारा के बीच बहकर आती ‘हासि (चॉप-स्टिक, जिससे जापानी लोग खाना खाते हैं)” पर पड़ी. वह बहुत खुश हुआ. ‘यह तो हासि (चॉप-स्टिक, जिससे जापानी लोग खाना खाते हैं) है. इसका अर्थ है कि यहां कोई न कोई आदमी ज़रूर रहता है.’ यह सोचकर वह नदी के किनारे-किनारे चल पड़ा. उसे अचानक किसी के रोने की आवाज़ सुनाई पड़ी. वह उसी दिशा में बढ़ गया. उसे पेड़ के नीचे एक झोंपड़ी दिखाई दी. रोने की आवाज़ वहीं से आ रही थी.

सुसानोओ झोंपड़ी के द्वार पर पहुंचा और उसके स्वामी को पुकारा, किन्तु किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया. थोड़ी प्रतीक्षा के बाद वह झोंपड़ी के भीतर घुस गया. उसने देखा कि एक बूढ़ा और बुढ़िया एक लड़की को घेरे फूट-फूटकर रो रहे हैं. उसने उनसे रोने का कारण पूछा, तो बूढ़े ने बताया, “मेरी आठ लड़कियां थीं. हर साल यामाता नामक भयंकर सांप आता है और एक लड़की को खा जाता है. इस तरह वह मेरी सात लड़कियां खा चुका है. अब केवल एक यही बची है. लेकिन अब फिर यामाता के आने का समय आ गया है. हमारे रोने का यही कारण है.”
इस बातचीत को सुनकर उस लड़की ने अपना चेहरा ऊपर उठाया. वह बहुत सुन्दर थी सुसानोओ उसकी ओर देखता रह गया. उसने मन ही मन सोचा कि इतनी सुन्दर लड़की को उस सांप के मुंह से बचाना चाहिए. उसने बूढ़े से सांप के विषय में पूछा. बूढ़े ने बताया, “यामाता बड़ा भयंकर सांप है. उसके आठ सिर और आठ पूंछ हैं. उसकी आंखें लाल-लाल जलती रहती हैं. उसका शरीर इतना विशाल है कि आठ पहाड़ों और आठ घाटियों को पार करते हुए उस पर काई जम जाती है तथा अनेक पौधे उग आते हैं.”
यह सुनकर सुसानोओ ने पक्का निश्चय किया कि वह भयंकर यामाता को मार डालेगा और उस सुन्दर कन्या की रक्षा करेगा.
उसने बूढ़े को आदेश दिया कि वह ऐसा बाड़ा तैयार करे, जिसमें आठ दरवाज़े हों . प्रत्येक दरवाज़े पर एक बड़ा मटका रख दे और उसे तेज़ शराब से भर दे. इस प्रकार का बलशाली सहायक पाकर बूढ़ा, बुढ़िया और वह लड़की काफी उत्साहित हुए . बूढ़ा बोला कि वह आदेशानुसार सब प्रबन्ध करेगा. इसके बाद सुसानोओ बोला, “क्षमा करें, मुझे पहली नज़र में ही आपकी पुत्री से प्रेम हो गया है. मेरी इच्छा है कि वही मेरी पत्नी बने.”
बूढ़े ने पूछा, “आपका क्या परिचय है?”
सुसानोओ ने उत्तर दिया, “मेरा नाम सुसानोओ है. मैं आमातेरासु महादेवी का छोटा भाई हूं और अभी-अभी ताकामाहारा से उतरकर यहां आया हूं.”
“क्षमा करें, मुझे आपके बारे में मालूम नहीं था. मैं अवश्य ही अपनी बेटी का हाथ आपके हाथ में सौंप दूंगा.” बूढ़े ने प्रसन्न होते हुए कहा.
सुसानोओ ने उस लड़की के हाथ को स्पर्श किया, तो वह कंघी में में बदल गई. सुसानोओ ने इस कंघी को अपने बालों में छिपा लिया. इसके बाद बूढ़े ने पहाड़ से लकड़ी और बांस लाकर आठ दरवाज़ों वाला बाड़ा तैयार कर दिया और बुढ़िया ने चावल की शराब तैयार करके उससे आठ दरवाज़ों पर रखे आठों मटके भर दिए. उसके बाद वे यामाता की प्रतीक्षा करने लगे.
उन्हें अधिक राह नहीं देखनी पड़ी. कुछ देर बाद ही उन्होंने देखा कि आकाश अचानक लाल हो गया, पृथ्वी कांपने लगी और काले बादल छा गए . कुछ क्षण में ही एक विशाल और भयंकर सांप आठ सिर खड़े किए उसी ओर आता दिखाई दिया. सुसानोओ ने अपनी तलवार पकड़ ली और मौके की तलाश में लग गया. यामाता बाड़े के निकट पहुंचा तो उसे सुगन्धित शराब की गंध मिली. उसने अपने आठों सिर आठों मटकों में डाल दिए. कुछ ही क्षणों में वह सारी शराब पी गया. उस पर शीघ्र ही नशा छा गया. वह बेहोश होकर वहीं पड़ गया. सुसानोओ ने तुरन्त अपनी तलवार से उस भयानक सांप पर वार पर वार करने लगा. इससे इतना खून निकला कि हिड्या नदी का पानी लाल हो गया.
जब यामाता मर गया तो सुसानोओ ने उसके टुकड़े करने शुरू किए. पहले उसने उसके एक-एक कर आठों सिर काट डाले. फिर धड़ टुकड़े-टुकड़े कर डाला और उसके बाद पूंछ काटने लगा. ठीक इसी समय आठवीं पूंछ में से एक आवाज़ आई. उसने उस पूंछ को चीरा तो उसमें से एक दिव्य तलवार निकली . सुसानोओ ने सोचा कि इसी तलवार ने उसकी रक्षा की है, इसलिए इसे अपने पास न रखकर किसी आदरणीय को भेंट देना चाहिए. उसने आमातेरासु का आह्वान करके वह तलवार उसे समर्पित की. वही तलवार आज तक जापान के राजसिंहासन के तीन चिह्नों में से एक के रूप में सुरक्षित है.
यामाता को मारने के बाद सुसानोओ ने बालों में छिपी कंघी निकाली . बालों से बाहर आते ही वह कंघी लड़की के रूप में बदल गई. प्राण बचने की खुशी में वह पहले से भी ज़्यादा सुन्दर हो गई थी. बूढ़े ने वचन के अनुसार अपनी पुत्री का विवाह सुसानोओ से कर दिया. सुसानोओ ने अपनी पत्नी के साथ सुखी जीवन बिताते हुए जापान देश का शासन किया. उनकी अनेक सन्तानें हुईं, जिनमें से ओओकुनिनुसि का नाम बहुत प्रसिद्ध है.
सुसानोओ ने अपनी सुखी जीवन को एक कविता के रूप में चित्रित किया था. इसे जापानी साहित्य के इतिहास में प्रथम कविता कहा जाता है. सुसानोओ विद्या और वीरता के प्रतीक देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं.
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FIRST PUBLISHED : December 7, 2023, 18:06 IST





