
साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित पुस्तकायन पुस्तक मेला के छठे दिन साहित्यिक पत्रिकाओं की पहचान और उनकी भूमिकाओं पर चर्चा हुई. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार ममता कालिया ने की. इस चर्चा में शैलेंद्र सागर कथाक्रम के संपादक शैलेंद्र सागर, हंस के संपादक संजय सहाय और बनास जन के संपादक पल्लव ने अपने विचार व्यक्त किए.
ममता कालिया ने साहित्यिक पत्रिकाओं पर कहा कि लघु पत्रिकाओं ने हिंदी साहित्य के कई नए आंदोलन खड़े किए और उससे हजारों पाठकों को जोड़ा. उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं के समर्थ इतिहास को प्रस्तुत करते हुए बताया कि कैसे रवींद्र कालिया की इलाहाबाद स्थित प्रेस में लघु पत्रिकाएं छापी जाती थीं और युवा पीढ़ी उन्हें खरीदने के लिए लालायित रहती थी.
हंस के संपादक संजय सहाय ने कहा कि साहित्यिक या लघु पत्रिका वही है, जिसमें कोई अंतर्निहित स्वार्थ न हो. उन्होंने लघु पत्रिकाओं को इस संदर्भ में भी याद किया कि उन्होंने नए और युवा साहित्यकारों को एक बड़ा मंच प्रदान किया.
शैलेंद्र सागर ने सोशल मीडिया से साहित्यिक पत्रिकाओं को मिल रही चुनौती का जिक्र करते हुए कहा कि अभी भी मुद्रित पत्रिकाओं को कोई बेहतर विकल्प नहीं है.
संजय सहाय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार हमारी सहायता करे तो उसके पीछे किसी उपकार का भाव नहीं होना चाहिए.
बनास जन के संपादक पल्लव ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं की पूंजी उनके पाठक हैं और हमें उनतक पहुंचने का निरंतर प्रयास करना चाहिए. उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रकाशित होने वाली कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें उनको भी प्रोत्साहित करने का कार्य करना चाहिए. पल्लव ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं की जरूरत किसी समाज के लिए इसलिए भी है क्योंकि वे साहित्यिक आंदोलन और विचारवान मानस बनाने का वातावरण तैयार करती हैं.
चर्चा की अध्यक्षता कर रही ममता कालिया ने साहित्यिक पत्रिकाओं के संघर्ष की एक व्यापक छवि प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं समर्पित लेखकों और संपादकों के श्रम से चलती हैं. उन्होंने कहा कि यह आज से 30 साल पहले भी सच था, और आज का भी सच है. ये पत्रिकाएं पैसे से नहीं, बल्कि साधना से निकलती हैं और जब तक इनको पसंद करने वाले पाठक है, जब तक यह निकलती रहेंगी.\
‘साहित्य मंच’ में कार्यक्रम में स्पेन के लेखक.
पु्स्तक मेला में ‘साहित्य मंच’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इसमें कार्यक्रम में स्पेन से पधारे 4 भाषाओं के 4 कवि आंजेल्स ग्रेगोरी, कास्टिय्यो सुआरेस, चूस पातो तथा मारिओ ओब्रेरो ने अपनी कविताएं मूल भाषा में प्रस्तुत कीं. इसके बाद कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद शुभ्र बंद्योपाध्याय ने सुनाया.
पुस्तक मेला में सजा कवि सम्मेलन का मंच
पुस्तक मेला का पांचवां दिन हिंदी कवियों के नाम रहा. लोकप्रिय कवि बुद्धिनाथ मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुए हिंदी कवि सम्मेलन में बी.एल. गौड़, हरेराम समीप, ज्ञानप्रकाश विवेक, विवेक गौतम और उपेंद्र पांडेय ने कविताएं प्रस्तुत कीं.
पुस्तक मेला में आयोजित कवि सम्मेलन में काव्य पाठ करते कवि.
उपेंद्र पांडेय ने ओजस्वी स्वर में कविताओं का पाठ किया. देशप्रेम से ओत-प्रोत उनकी कविताओं में वतन के सैनिकों के प्रति सम्मान दिखा तो गलवान के वीर शहीदों को भी उन्होंने बड़े सम्मान से याद किया.
विवेक गौतम ने वर्तमान हालात पर टिप्पणी करते हुए कमर तोड़ महंगाई पर तो कुछ कविताएं सुनाईं. उन्होंने मां पर भी एक मार्मिक कविता प्रस्तुत की. प्रख्यात कथाकार और ग़ज़लकार ज्ञानप्रकाश विवेक ने अपनी कई ग़ज़लों से भरपूर वाह-वाह लूटी. उनका एक शेर था – मेरे फिसलने का कारण था यही शायद, कि हर कदम बहुत आजमाकर रखता था.
हरेराम समीप ने अपने सारगर्भित दोहों से रंग जमाया. उनका एक दोहा जो ख़ूब पसंद किया गया वह था- जो जैसा जब भी मिला, लिया उसी को संग, यारों मेरे प्यार का पानी जैसा रंग. एक अन्य दोहा था- पुलिस पकड़कर ले गई उसको अपने साथ, आग बुझाने में जले जिसके दोनों हाथ.
वरिष्ठ कवि बी.एल. गौड़ ने कविता और गीत प्रस्तुत किए, जिनमें मानव स्वभाव, प्रकृति को नए तरीक़े से देखा गया था. उनकी एक कविता थी -पत्थरों की काट से जो शोर होता है, समझ लेना कहीं पर निर्माण होता है, ईट पत्थरों में भी प्राण होता है.
.





