
जोश मलीहाबादी का आज जन्मदिवस है. वे जितने बड़े शायर थे, उनके जीवन से जुड़े किस्से भी उतने ही रोचक रहे हैं. वे हर जगह गलत काम का विरोध किया करते थे. उन्हें शायर-ए-इंकलाब कहा जाता है. गुस्सा इतना कि प्रधानमंत्री तक को खरी-खरी सुना दिया करते थे. खुद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू उनके गुस्से से डरा करते थे. उन्होंने अपने जीवन पर एक किताब लिखी थी- यादों की बारात. मूलतः यह उर्दू में लिखी गई थी. 1970 में प्रकाशित इस किताब का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया.
यादों की बारात में जोश मलीहाबादी के जीवन से जुड़े कई ऐसे रोचक किस्से हैं, जो हैरान करते हैं. इस पुस्तक का एक अंश यहां प्रस्तुत किया जा रहा है. आप भी इसका लुत्फ उठाएं-
शायर जोश मलीहाबादी की जिंदगी उतार-चढ़ाव से भरी रही. लखनऊ से लगे मलीहाबाद के एक बड़े जागीरदार परिवार में जन्म लेने वाले इस शायर ने अभाव का दौर भी देखा, लेकिन जिंदगी शानदार तरीके से जी. यहां तक कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु से भी इनके संबंध बहुत अच्छे थे लेकिन उन्हें भी बहुत कड़ी चिट्ठी लिखने से गुरेज नहीं किया. कहा जाता है कि जब जोश मलीहाबादी पाकिस्तान जाने की जिद कर रहे थे तो पंडित नेहरु ने उन्हें पहले उस दौर के शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम से मिलने की सलाह दी थी. मौलाना ने मिलने में देर लगाई तो जोश ने एक पर्चे पर लिख भेजा- नामुनासिब है खून खौलाना, फिर किसी और वक्त मौलाना.
हालांकि इस शेर का कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता. लेकिन अपने मिजाज से जीने वाले जोश मलीहाबादी के अंदाज को ये शेर बयान करता दिखता है. जो तबीयत में आया उन्होंने वही किया.
मजाज़ लखनवी ने कहा था- जोश साहब घड़ी रख कर पीते हैं, मेरा बस चले तो घड़ा सामने रख कर पीयूं
प्रधानमंत्री नेहरु से बहुत अच्छे संबंध थे. छुट्टियां बिताने पहाड़ों में पहुंचे पंडित नेहरु से मिलाने से उनके सहायकों ने जोश मलीहाबादी को मना कर दिया. लौट कर उन्होंने प्रधानमंत्री को ऐसा पत्र लिखा दिया कि जोश से सुलह के लिए नेहरू को जुगत लगानी पड़ी. उन्होंने इंदिरा गांधी के जरिए जोश को तीन मूर्ति बुलवाया. हालांकि जोश इस शर्त पर पीएम आवास आने को तैयार हुए कि मुलाकात के दौरान पंडित नेहरु नहीं रहेंगे. इस मुलाकात में प्रधानमंत्री ने अपने सहायक का तबादला किया और तब जा कर दोनों के बीच सुलह हो सकी.
बाकये का जिक्र करते हुए जोश मलीहाबादी ने अपनी किताब ‘यादों की बारात’ में लिखा है- “एक बार मैं गर्मी की छुट्टियां मनाने के लिए शिमला गया हुआ था. 3-4 रोज के बाद मालूम हुआ कि पंडित जवाहरलाल भी आ गए हैं. वह जहां ठहरे थे, मैंने वहां फोन किया, बदकिस्मती से रिसीवर उठाया उनके एक नए सेक्रेटरी ने जो लहजे से मद्रासी मालूम हो रहा था. मैंने उसको अपना नाम बता कर कहा मैं पंडितजी से मिलना चाहता हूं और आप उनसे वक़्त तय करके मुझे बता दें. उस गंवार ने कभी मेरा नाम सुना ही नहीं था. उसने बार-बार मुझसे मेरा नाम पूछा, मैंने कहा जोश मलीहाबादी, लेकिन उसकी समझ में नहीं आया. आखिरकार मैंने झल्ला कर कहा, ‘जे, ओ, एस, एच.’ उसने कहा, ‘मिस्टर जाश, आपकी तफसील क्या है?’ मैंने कहा, ‘जो शख्स मेरे बारे में नहीं जानता, उसको यह हक नहीं कि वह हिंदुस्तान में रहे.’ यह सुन कर उसने कहा, ‘ओह, ऐसे बोलेगा.’ मैंने कहा, ‘इससे ज्यादा बोलेगा.’ उसने कहा, ‘आप होल्ड किए रहें, हम पंडित जी से पूछ कर बताएगा.’ और 2 मिनट के बाद उसने कहा, ‘पंडित जी ने ऐसा बोला है कि हम यहां मजे करने आया है, आप दिल्ली में आकर मिलो.”
इसके आगे जोश मलीहाबादी लिखते हैं -“यह जवाब सुन कर मेरे तन-बदन में आग लग गई, मैंने बीवी से कहा, ‘वजीरे-आज़म बन जाने के बाद पंडितजी का दिमाग खराब हो गया है. मैं अभी उनको ऐसा खत लिखूंगा कि वह तिगनी का नाच नाचने लगेंगे.’ बीवी ने कहा, ‘हमारे सर की कसम अभी खत न लिखो, इस वक़्त गुस्से में भरे हुए हो, न जाने क्या-क्या लिख मारोगे, पानी पी कर थोड़ी देर लेट जाओ.’ मरता क्या न करता, पानी पीकर लेट तो गया, मगर दिल की आग भड़कती रही. आध घंटे से ज्यादा लेट नहीं सका, बिस्तर पर अंगारे दहकने लगे, मैं उठ बैठा और ऐसा खत लिखा कि अगर उस किस्म का खत किसी थानेदार तक को लिख भेजता, तो वह भी तमाम उम्र मुझे माफ न करता.”
उन्होंने आगे लिखा है कि अगले दिन इंदिरा गांधी ने फोन किया और चाय पर घर आने को कहा. जबकि जोश ने साफ कह दिया था कि “बेटी वहां तुम्हारा बाप होगा. और उससे मिलना नहीं चाहता.” बहरहाल, इंदिरा गांधी से पंडित नेहरु के वहां न होने का आश्वासन पाकर वे गए. वहां पंडित जी ने मौका पाकर जोश से मुलाकात की और न सिर्फ अपनी सफाई दी. बल्कि अपने उस सहायक को बुला उससे पूछा कि बिना पीएम से पूछे उसने ऐसा जवाब कैसे दे दिया. साथ ही उस सहायक का ट्रांसफर दूसरे विभाग में कर दिया. जोश लिखते हैं – “उनका यह बर्ताव देख कर मैं पानी-पानी हो गया और उनकी बेमिसाल शराफ़त पर निगाह करके मैं उनको गले लगा कर रोने लगा.” जोश ने अपने इसी लेख में पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है -“ऐ लाफ़ानी जवाहरलाल नेहरू, रूहे-इंसानियत का सजदा कुबूल कर.”
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FIRST PUBLISHED : December 5, 2023, 14:33 IST





