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“मुझ को ये आरज़ू वो उठाएं नक़ाब ख़ुद, उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई…” मजाज़ की परवरिश बेहद खुशहाल और संपन्न माहौल में हुई थी. अपनी शुरुआती पढ़ाई उन्होंने रुदौली के एक स्कूल में हासिल की, उसके बाद वो लखनऊ चले गए. उनकी शायरी के दो फलक हैं- एक इश्किया, दूसरा इन्कलाब़ी. आगरा में वह इश्किया शायर थे, अलीगढ़ आते-आते शबाब उनका इंकलाब में तब्दील हो गया. वह दौर स्वतंत्रता आंदोलन के तूफानों से गुजर रहा था. देश के नामी कवि-शायर, साहित्यकार, फनकार इंकलाबी गीत गाने लगे थे. उन दिनों वह डॉ अशरफ, अख्तर हुसैन रामपुरी, सब्त हसन, सज्जाद जहीर, अख्तर रायपुरी, सरदार जाफरी, जज्बी आदि के करीब आएं.





