
बात जब हिंदी साहित्य की होती है, तो वो हर ज़र्रा जावेद साहब के शब्दों की खुशबू से महकने लगता है, जिनमें कविताएं अपना घर बनाकर रहा करती हैं. उनकी कविताओं का जादू दशकों से साहित्य प्रेमियों के दिलों पर राज कर रहा है. दिल के दर्द की आवाज़ कविताओं में सुननी हो, तो जावेद साहब वहां सबसे ऊपर दिखाई पड़ते हैं.
जावेद साहब की कविताओं की पहली लाइन ही पढ़कर इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है कि ये कविता किसी और की नहीं, जावेद साहब की कलम से निकली है. उनकी कविताओं की ताज़गी कभी फिकी नहीं पड़ती, बल्कि सालों बाद भी अपनेपन का अहसास दिलाती हैं. यही है जावेद साहब के शब्दों की ताकत जो हर मन को अपने मन से जोड़ लेती है.
प्रस्तुत हैं जावेद अख़्तर की चार चुनिंदा कविताएं, जिनमें दिल का दर्द भी रोमांचित करता है-
1)
ये दुनिया तुम को रास आए तो कहना
ये दुनिया तुम को रास आए तो कहना
न सर पत्थर से टकराए तो कहना
ये गुल काग़ज़ हैं ये ज़ेवर हैं पीतल
समझ में जब ये आ जाए तो कहना
बहुत ख़ुश हो कि उस ने कुछ कहा है
न कह कर वो मुकर जाए तो कहना
बदल जाओगे तुम ग़म सुन के मेरे
कभी दिल ग़म से घबराए तो कहना
धुआं जो कुछ घरों से उठ रहा है
न पूरे शहर पर छाए तो कहना
2)
हम तो बचपन में भी अकेले थे
हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे
इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
इक तरफ़ आंसुओं के रेले थे
थीं सजी हसरतें दुकानों पर
ज़िंदगी के अजीब मेले थे
ख़ुद-कुशी क्या दुखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे
ज़ेहन ओ दिल आज भूके मरते हैं
उन दिनों हम ने फ़ाक़े झेले थे
3)
सूखी टहनी तन्हा चिड़िया फीका चांद
सूखी टहनी तन्हा चिड़िया फीका चांद
आंखों के सहरा में एक नमी का चांद
उस माथे को चूमे कितने दिन बीते
जिस माथे की ख़ातिर था इक टीका चांद
पहले तू लगती थी कितनी बेगाना
कितना मुबहम होता है पहली का चांद
कम हो कैसे इन ख़ुशियों से तेरा ग़म
लहरों में कब बहता है नद्दी का चांद
आओ अब हम इस के भी टुकड़े कर लें
ढाका रावलपिंडी और दिल्ली का चांद
4)
ज़िंदगी की आंधी में ज़ेहन का शजर तन्हा
ज़िंदगी की आंधी में ज़ेहन का शजर तन्हा
तुम से कुछ सहारा था आज हूं मगर तन्हा
ज़ख़्म-ख़ुर्दा लम्हों को मस्लहत संभाले है
अन-गिनत मरीज़ों में एक चारागर तन्हा
बूंद जब थी बादल में ज़िंदगी थी हलचल में
क़ैद अब सदफ़ में है बन के है गुहर तन्हा
तुम फ़ुज़ूल बातों का दिल पे बोझ मत लेना
हम तो ख़ैर कर लेंगे ज़िंदगी बसर तन्हा
इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
ढूंढता फिरा उस को वो नगर नगर तन्हा
झुटपुटे का आलम है जाने कौन आदम है
इक लहद पे रोता है मुंह को ढांप कर तन्हा
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Javed akhtar, Poem
FIRST PUBLISHED : December 3, 2023, 12:59 IST





