इस चाय में बड़े-बड़े गुन- जवान बनाए, बीमारी भगाए!

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भारत के अधिकतर घरों में एक प्याली चाय के बिना सुबह की शुरुआत नहीं होती. चाय भारत देश में सबसे अधिक लोकप्रिय ड्रिंक है. आम हो या खास सब चाय की चुस्कियां लेते हैं. गौरतलब है, कि मानव सभ्यता और संस्कृति जैसे-जैसे विकसित और अग्रसर होती गई, उसके साथ-साथ हमने पेड़-पौधों और उनके तमाम अंगों के साथ तरह-तरह के परीक्षण भी करने शुरू कर दिए. चाय एक ऐसा ही उदाहरण है जो हमारे सभ्य होने के दौर के साथ हमारे दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बनती गई. हालांकि यह बात कम ही लोग जानते होंगे कि चाय का सर्वप्रथम प्रयोग एक औषधि के तौर पर किया गया था. जड़ी-बूटियों के जानकार समय-समय पर तमाम रोगों के इलाज के लिए चाय की ताज़ी पत्तियों और इसके बीजों को औषधि के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं. जैसे-जैसे समय बीता, चाय हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बनती गई और दिन की शुरुआत में पहले पेय के रूप में हमारे परिवारों के बीच प्रचलित होती गई.

डॉ दीपक आचार्य की पुस्तक ‘जंगल लैबोरेटरी’ का उद्देश्य हिंदुस्तान के सुदूर आदिवासी अंचलों से एकत्र किए गए ज्ञान को एक जगह समेटकर किताब के रूप में प्रस्तुत करने की कामयाब कोशिश है. इस पुस्तक का उद्देश्य यही है कि हर्बल ज्ञान को आम इंसानों तक पहुंचाया जाए. डॉ आचार्य ने हर्बल ज्ञान पर गहरी शोध करने के साथ इसे बेहद करीब से जांचा और परखा और जब तक इस जीवित रहे अपने ज्ञान की पैठ को दुनिया के सामने लाने के लिए लगातार डटे रहे. उनकी पुस्तक ‘जंगल लैबोरेटरी’ कई तरह के औषधीय पौधों के माध्यम से बड़ी से बड़ी शारीरिक दिक्कतों को दूर करने में कारगर है, जिनमें से एक है ‘चाय का सेवन’. यह सच है कि चाय की चुस्कियों में कई तरह गुण विद्यमान हैं, जो अनेक प्रकार की बीमारियों को दूर करने के साथ जवानी की रंगत को भी बरकरार रखती हैं.

ग्रामीण हर्बल जानकारों के अनुसार खाद्य और पेय पदार्थों का सेवन संतुलित मात्रा में किए जाने से कई रोगों से दूर-दूर तक आपका पाला नहीं पड़ता है. इसलिए चाय भी फंक्शनल फूड और बेवरेज की श्रेणी में रखी गई है. समय-समय पर चाय के अनेक प्रकारों और सेवन की विधियों पर शोध होते रहे हैं और हमने अपनी सहूलियतों के अनुसार अलग-अलग तरह की चायों को अपने जीवन का हिस्सा बनाया है. ‘ग्रीन टी’ के नाम से प्रचलित ‘गौती चाय’ (लेमन ग्रास) की बात हो या संतरे के छिलकों की सुगन्ध लिए ‘ऑरेंज टी’ या मुलेठी का स्वाद लिए ‘मीठी चाय’. हर तरह की चाय का एक ख़ास स्वाद और औषधीय गुण है.

जंगल लैबोरेटरी : डॉ दीपक आचार्य

जंगल लैबोरेटरी : डॉ दीपक आचार्य

पातालकोट के आदिवासियों के बीच काली चाय मेहमान-नवाज़ी का एक अहम हिस्सा है. ज़बर्दस्त मिठास लिए यह काली चाय बगैर दूध की होती है. इस चाय को तैयार करने के लिए 2 कप पानी में 1 चम्मच चाय की पत्ती और 3 चम्मच शक्कर को डालकर उबाला जाता है. जब चाय लगभग एक कप शेष रह जाती है तो इसे उतारकर छान लिया जाता है और परोसा जाता है. हर्बल जानकारों के अनुसार, मीठी चाय दिमाग को शान्त करने में काफी सक्रिय भूमिका निभाती है यानी यह तनाव कम करने में मदद करती है. आधुनिक शोध भी चाय के इस गुण को प्रमाणित करते हैं.

वहीं दूसरी तरफ, बुंदेलखंड में मेहमानों का आदर-सत्कार अक्सर ‘गौती चाय’ या हरी चाय से किया जाता है. लेमन ग्रास के नाम से प्रचलित इस चाय का स्वरूप एक घास की तरह होता है. हल्की-सी नींबू की सुंगध लिए इस चाय की चुस्की गज़ब की ताजगी ले आती है. लेमन ग्रास की तीन पत्तियों को हथेली पर मसलकर दो कप पानी में डाल दिया जाता है और उबाला जाता है. स्वादानुसार शक्कर डालकर इसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि यह एक कप बचे. जो लोग अदरक का स्वाद पसन्द करते हैं, वे थोड़ा-सा अदरक कुचलकर इसमें डाल सकते हैं. इस चाय में भी दूध का उपयोग नहीं होता है.

गौती चाय में कमाल के एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर के अन्दर किसी भी प्रकार के संक्रमण को नियंत्रित करने में असरदार है. गौरतलब है, कि यह चाय मोटापा कम करने में काफी सक्षम है. डॉ आचार्य की पुस्तक ‘जंगल लैबोरेटरी’ के अनुसार आधुनिक शोध भी इस तथ्य को प्रमाणित करते दिखाई देते हैं. हरी चाय वसा कोशिकाओं यानी एडिपोसाईट्स के निर्माण को रोकती है और शायद यही वजह है कि दुनियाभर के अनेक देशों में गौती चाय को मोटापा कम करने की औषधि के तौर पर देखा जा रहा है, जिस पर निरंतर शोध जारी है.

शोध की मानें, तो वसा और कॉलेस्ट्रॉल को कम करने वाले प्रोटीन काईनेज़ को क्रियाशील करने में गौती चाय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. गौती चाय बनाते समय संतरे या नींबू के छिलके डाल दिए जाते हैं और कुछ मात्रा नींबू के रस की भी डाल दी जाती है. यह स्वाद में खट्टी होती है. मूल रूप से गोंड, कोरकु और बैगा जनजातियों के बीच प्रचलित इस चाय के भी गज़ब के औषधीय गुण हैं. गांव के बुजुर्गों से उनकी लंबी उम्र का राज़ पूछा जाए तो सीधा जवाब मिलता है, ‘खट्टी गौती चाय’ और मजे की बात यह भी है कि सदियों पुराने इस एंटी एजिंग फॉर्मूले को आदिवासी खूब अपनाते हैं और अब आधुनिक विज्ञान भी इस पर ठप्पा लगाना शुरू कर रहा है. नए आधुनिक शोध परिणाम बताते हैं कि हरी चाय और नींबू का मिश्रण उम्र के बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है, यानी आप इस चाय का प्रतिदिन सेवन करें तो अपने यौवन को लंबा खींच सकते हैं.

वहीं, बस्तर की सैदी या मीठी चाय बेहद स्वादिस्ट होती है. शहद होने की वजह से इस चाय को ‘शहदी चाय या सैदी चाय’ कहा जाता है. दंतेवाड़ा के किसी दूरस्थ गांव में आप जाएंगे तो आपका स्वागत सैदी चाय से होगा. यह चाय शरीर में गज़ब की स्फूर्ति लाती है. शहद, अदरक और चाय के अपने-अपने औषधीय गुण हैं और जब ये एक साथ आते हैं तो गज़ब का टॉनिक बन जाते हैं.

गुजरात की बात करें, तो वहां के किसी भी गांव में मेहमानी के तौर पर ‘मसाला चाय’ स्वागत के लिए पेश की जाती है. घरों में अक्सर मेहमान-नवाज़ी के लिए छाछ या चाय का उपयोग किया जाता है. यदि आप चाय के शौकीन हैं तो आपको मसाला चाय परोसी जाएगी. काली मिर्च, सौंठ, तुलसी, दालचीनी, छोटी इलायची, बड़ी इलायची, पीपरामूल, जायफल, जायपत्नी और लौंग मिलाकर मसाला तैयार किया जाता है. चाय पत्ती और दूध के साथ उबलते पानी में यह चुटकीभर मसाला डाल दिया जाता है. स्वादिष्ट मसाला चाय जब आपको परोसी जाती है, तो यह न सिर्फ गज़ब का स्वाद लिए होती है बल्कि शरीर ताज़गी से भर जाता है. सौराष्ट्र में ‘जेठीमद चाय’ के नाम से मशहूर इस चाय को मध्यभारत में ‘मुलेठी चाय’ के नाम से जाना जाता है. मुलेठी के गुणों की वजह से यह चाय सेहत के लिहाज से अत्यन्त लाभकारी होती है.

वहीं राजस्थान के काफी हिस्सों में ‘धनिया की चाय’ स्वास्थ्य सुधार के लिए दी जाती है. लगभग 2 कप पानी मैं जीरा, धनिया, चायपत्ती और कुछ मात्रा में सौंफ डालकर करीब 2 मिनट तक खौलाया जाता है, आवश्यकतानुसार शक्कर और अदरक भी डाल दिया जाता है. कई बार शक्कर की जगह शहद डालकर इसे और भी स्वादिष्ट बनाया जाता है. गले की समस्याओं, अपचन और गैस से त्रस्त लोगों को इस चाय का सेवन कराया जाता है. स्वाद के साथ सेहत भी बेहतर करने वाली इस चाय को ‘धनिया चाय’ के नाम से जाना जाता है.

पातालकोट में सर्द दिनों में अक्सर आदिवासी ‘अनंतमूली चाय’ पीते हैं. अनंतमूल स्वभाव से गर्म प्रकृति का पौधा होता है. इसकी जड़ें निकालकर फिर उन्हें धोकर साफ करके 1 ग्राम जड़ को पानी में खौलाया जाता है. इसी पानी में थोड़ी-सी चाय की पत्तियों को भी डाल दिया जाता है. यह दमा और सांस की बीमारी से ग्रस्त रोगियों को दी जाती है. जब ज्यादा ठंड पड़ती है तो इसी चाय का सेवन सभी लोग करते हैं, यह चाय शरीर में गर्मी बनाए रखती है. अनंतमूल का उपयोग करने की वजह से इसे अनंतमूली चाय के नाम से जाना जाता है.

चाय के इन रूपों और औषधीय फायदों को देखते हुए यह बात तो साफ है, कि पारंपरिक ज्ञान को यदि सही तरह से अपनाया जाए तो चाय स्वाद के साथ-साथ सेहत की बेहतरी के लिए भी लाभप्रद है. औषधीय गुणों को आत्मसात किए हुए इस तरह के पारंपरिक चाय-पेय को समय-समय पर अपनाया जाए तो कई तरह को रोगों को दूर करने में मदद मिलती है. गौरतलब है कि भारत के पारंपरिक पेय दुनिया के किसी भी बड़े शहर के डिपार्टमेंटल स्टोर पर बिकने वाले तथाकथित फंक्शनल फूड और ड्रिंक्स से कम नहीं.

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