
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना विधानसभा चुनाव के नतीजों में किसी को खुशी मिली तो किसी को गम. किसी को कुर्सी मिली तो किसी की कुर्सी छिनी. चुनाव में जीत के लिए नेताओं ने एड़ी चोटी का जोर लगाया, पैसा पानी की तरह बहाया, दिन-रात एक कर दिया. फिर भी कुर्सी ना मिली. किसी भी नेता के लिए कुर्सी ना मिलने का दुख संसार में सबसे बड़ा दुख होता है. दुख तो दुख होता है, समय के साथ धीरे-धीरे ये चुनीवी जख्म भरेंगे. चुनावी हार में नेताओं को दिलासा देने के लिए हमारे लेखक, कवियों और शायरों ने खूब लिखा है.
01

मशहूर शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी साहब ने शायद इस गम की घड़ी के लिए ही लिखा था- ‘बर्बादियों का सोग मनाना फुजूल था, बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया’. सही कहा है अब सिर पीटने के क्या फायदा, उठो और अगले चुनाव की तब तक तैयारी करते रहें जब तक कुर्सी ना मिल जाए.
02

दिल या सपने टूटने या फिर कुर्सी छिनने पर मशहूर शायर मंजर भोपाली लिखते हैं- ‘इसी होनी को तो किस्मत का लिखा कहते हैं, जीतने का जहां मौका था वहीं मात हुई.’
03

इस बार कुर्सी नहीं मिली तो क्या हुआ, फिर से कोशिश होनी चाहिए. इस पर मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली साहब कहते हैं- ‘कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन, फिर इस के बाद थोड़ा मुकद्दर तलाश कर.’
04

कुर्सी के लिए नेता ना जाने कितने साल कड़ी मेहनत करता है, बड़ी मुश्किल से कुर्सी पर बैठने का मौका मिलता है. जिन लोगों को कुर्सी पर विराजने का मौका मिलता है, निश्चित ही वे बड़े सौभाग्यशाली होते हैं. शायद ऐसे ही लोगों के लिए इकबाल ने लिखा था- ‘हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है’
05

कुर्सी जाने का गम इतना गहरा होता है कि नेताओं को अगले चुनावों तक चैन नहीं पड़ेगा. मानो दुनिया में और कोई काम ही नहीं हो. शायद ऐसे नेताओं को देखकर ही महान शायर जॉन एलिया ने लिखा था- “ये मुझे चैन क्यूं नहीं पड़ता, एक ही शख़्स था जहान में क्या.”
06

चुनावों के नतीजे अप्रत्याशित रहे हैं. जिन्हें पूरा भरोसा था कि कुर्सी उन्हें ही मिलेगी, वे कुर्सी के नजदीक तक ना पहुंच पाए. मशहूर शायर उम्मीद फ़ाज़ली का यह शेर हारे हुए नेताओं पर बिल्कुल फिट बैठता है- “कल उस की आंख ने क्या जिंदा गुफ़्तुगू की थी, गुमान तक न हुआ वो बिछड़ने वाला है.”
अगली गैलरी
अगली गैलरी





