
नई दिल्ली. पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने चार में से तीन राज्यों में बाजी मारी. इन चुनावों में बीजेपी ने नई योजना पर काम किया, जिसके तहत केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को भी चुनाव में उतारा गया. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में मंत्री और सांसद भी विधानसभा के चुनावों में बतौर उम्मीदवार मैदान में थे. पार्टी की नई प्लानिंग रंग लाई और तीन राज्यों में बीजेपी सरकार बनाने में सफल रही. हालांकि इस फैसले से बीजेपी के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई है. पार्टी को 14 दिन के भीतर फैसला लेना होगा कि वो लोकसभा और विधानसभा में से किसकी सदस्यता छोड़ने जा रहे हैं. अन्यथा चुनाव आयोग इस पर एक्शन लेगा.
दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 101(2) के तहत अगर कोई लोकसभा सदस्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में बतौर उम्मीदवार भाग लेता है और जीत भी जाता है तो ऐसी स्थिति में उसे नोटिफिकेशन जारी होने के 14 दिन के भीतर लोकसभा या विधानसभा में से किसी एक सदन से इस्तीफा देना होता है. ऐसा नहीं करने पर उसकी लोकसभा की सदस्यता अपने आप खत्म हो जाती है.विधानसभा के सदस्य के लोकसभा चुनाव जीतने पर भी यही कंडीशन लागू होती है.
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मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी मैदान में
बीजेपी ने चार राज्यों में कुल 21 सांसदों को मैदान में उतारा था. राजस्थान और मध्य प्रदेश में सात-सात सांसदों को विधानसभा के टिकट दिए गए. ऐसे ही छत्तीसगढ़ में चार और तेलंगाना में तीन सांसदों ने विधानसभा चुनाव लड़ा. बीजेपी ने अपने दिग्गजों को चुनाव लड़वाया. केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद सिंह पटेल और फग्गन सिंग कुलस्ते चुनाव लड़े.

शपथ लेने को लेकर क्या है नियम?
चुनाव आयोग के नियम के अनुसार लोकसभा सदस्य रहते हुए विधायक पद की शपथ ग्रहण नहीं कर सकते. अगर ऐसा करते हैं तो उन्हें लोकसभा स्पीकर को इसकी सूचना देनी होगी. साथ ही अगर उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है तो चुनाव आयोग द्वारा जीत का नोटिफिकेशन जारी होने के 14 दिन बार अपने आप उनकी सदस्यता रद्द हो जाएगी.
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FIRST PUBLISHED : December 3, 2023, 21:12 IST





