जगदीश चंद्र बोस: भारत के वैज्ञानिक पुनर्जागरण के अग्रदूत | – News in Hindi

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सन 1884 में एक प्रतिभाशाली भारतीय युवक ब्रिटेन की प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा अर्जित कर स्वदेश लौटा. यहां आकर उसने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन से मुलाकात की और उनसे भारत की इंपीरियल एजुकेशन सर्विस में भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं देने की इच्छा जाहिर की. वह युवक रॉयल सोसाइटी, लंदन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक लॉर्ड रैले की एक चिट्ठी भी लेकर आया था, जिसमें लिखा था कि मेरे इस मेधावी छात्र को भारत में भौतिकी पढ़ाने का अवसर दिया जाना चाहिए.

रिपन उस युवक की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए और उसे नियुक्ति का आश्वासन भी दिया. लेकिन जब वह कलकत्ता आकर इंपीरियल एजुकेशन सर्विस के अधिकारियों से मिला तब उससे कहा गया कि भारत के लोगों में तर्कपूर्ण विचार करने की क्षमता नहीं है, इसलिए उन्हें भौतिकी जैसे जटिल विषय को पढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. लेकिन उस युवक ने हार नहीं मानी. काफी दौड़-धूप और वायसराय के निजी हस्तक्षेप के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में उसे भौतिकी के अस्थायी प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति हासिल करने में कामयाबी मिली.

मगर उसकी कठिनाइयों का अभी अंत नहीं हुआ था. उन दिनों ब्रिटिश प्रशासन भारतीय लोगों के साथ खुलेआम भेदभाव करती थी. एक ही पद पर नियुक्त भारतीयों को अंग्रेजों की तुलना में दो-तिहाई वेतन मिलता था. और, चूंकि उस युवक की नियुक्ति अस्थायी थी, इसलिए उसे दो-तिहाई का भी आधा वेतन मिलने वाला था! उस युवक ने इस पक्षपात का बेहद अनूठे ढंग से विरोध किया, उसने आधा वेतन लेने से इनकार कर दिया और तीन साल तक तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बिना वेतन के पूरी तन्मयता से शिक्षण और शोधकार्य करता रहा.

आखिरकार 1988 में ब्रिटिश प्रशासन को उस युवक के न्यायोचित मांग के आगे झुकना पड़ा और तब जाकर उसे बकाया राशि के साथ पूरा वेतन और स्थायी नियुक्ति मिली. हम यह कह सकते हैं कि जिस ‘सत्याग्रह’ की अवधारणा को बाद में महात्मा गांधी ने पूरे देश में फैलाया था, उस युवक ने इसकी अनौपचारिक शुरुआत 1885 में ही कर दी थी!

अपनी कुशाग्र बुद्धि, गहन ज्ञान, अनुसंधान और शिक्षण के प्रति अद्भुत उत्साह तथा सुसंस्कृत व्यवहार की बदौलत यही युवक आगे चलकर भारत के प्रथम आधुनिक वैज्ञानिक के रूप में मशहूर हुआ. नाम है: आचार्य जगदीश चंद्र बोस. भारतीय विज्ञान के इतिहास में अद्वितीय स्थान रखने वाले इन्हीं जगदीश चंद्र बोस का आज जन्मदिन है. आइए, इनके व्यक्तिव और कृतित्व पर संक्षेप में चर्चा करते हैं.

जगदीश चंद्र बोस का जन्म 30 नवंबर, 1858 को ढाका के मैमनसिंह (जो अब बांग्लादेश में है) नामक गांव में एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था. उस समय उनके पिता भगवान चंद्र बोस डिप्टी मजिस्ट्रेट थे. भगवान चंद्र भारतीय परंपराओं और संस्कृति के प्रति समर्पित व्यक्ति थे. शायद इसीलिए, उस दौर में जब संपन्न परिवारों के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने जाते थे, उन्होंने जगदीश को प्राथमिक शिक्षा एक स्थानीय स्कूल से मातृभाषा बंगाली में दिलवाई.

बाद में उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर्स स्कूल में दाखिला लिया और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बीए (भौतिकी) की परीक्षा पास की. आगे की पढ़ाई के लिए वे 1880 में इंग्लैंड गए और लंदन में चिकित्साशास्त्र का अध्ययन शुरू कर दिया. लेकिन तबीयत खराब होने की वजह से एक साल बाद ही उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी.

इसके बाद उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान पढ़ने के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. कैम्ब्रिज में शानदार अकादमिक प्रदर्शन करते हुए 1884 में उन्होंने बीएससी की डिग्री हासिल की. 1884 में ही बोस भारत लौटे. किस तरह काफी कठिनाइयों के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज में उन्हें भौतिकी के अस्थायी प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिली, जिसका वर्णन हम लेख की शुरुआत में कर चुके हैं.

जल्दी ही बोस प्रेसीडेंसी कॉलेज में एक योग्य और निष्ठावान अध्यापक के रूप में जाने लगे. 1894 में अपने 36वें जन्मदिन पर बोस ने शिक्षण की सीमा से बाहर निकल कर वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी सक्रिय होने का फैसला किया. लेकिन इसके लिए उनके पास न तो कोई प्रयोगशाला, न कोई उपकरण, और न ही कोई सहयोगी था, ऊपर से अंग्रेजों का अड़ियल रवैया. लेकिन बोस ने इन सबका सामना किया, इसके लिए उन्होंने कॉलेज के एक बंद पड़े गुसलखाने में एक छोटी-सी प्रयोगशाला स्थापित की! यहां तक कि उपकरणों और प्रयोगों के लिए अपना पैसा भी खर्च किया.

बोस ने अपने शोध की शुरुआत विद्युत-चुंबकीय तरंगों (रेडियो और माइक्रोवेव) का अध्ययन करने से किया. इसी क्रम में उन्होंने वायरलेस टेलीग्राफी से संबंधित कई प्रयोगों को अंजाम दिया. उन्होंने 1895 में संचार के लिए रेडियो तरंगों का उपयोग करने का एक तरीका कलकत्ता के टाउनहाल में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया और 1899 में लंदन में रॉयल सोसाइटी में एक शोधपत्र भी प्रकाशित करवाया.

रेडियो तरंगों को पकड़ने के पीछे का विज्ञान सबसे पहले बोस द्वारा ही प्रदर्शित किया गया था, लेकिन वैज्ञानिक ज्ञान के मुक्त उपयोग का पक्षधर होने की वजह से उन्होंने अपने काम का कभी पेटेंट नहीं करवाया. आज गुग्लीमो मार्कोनी को रेडियो का आविष्कारक माना जाता है, जबकि मार्कोनी से दो साल पहले इसको खोजने वाले बोस को इसका श्रेय नहीं मिला! हालांकि वे इससे निराश नहीं हुए और उन्होंने भौतिकी के विभिन्न विषयों पर अपने शोधकार्य जारी रखे.

1896-97 में रॉयल सोसाइटी से प्राप्त एक स्कॉलरशिप के तहत बोस को फ्रांस, इंग्लैंड और जर्मनी की यात्रा करने का अवसर मिला. इस यात्रा के दौरान विभिन्न संस्थानों में दिए गए बोस के भाषणों की काफी प्रशंसा हुई. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंदन विश्वविद्यालय ने उन्हें कोई परीक्षा लिए बिना ही डाक्टर ऑफ साइंस की उपाधि दे दी!

भारत आने पर बोस ने डिटेक्टरों की खोज पर अपना ध्यान केंद्रित किया. जिस डिटेक्टर की उन्होंने खोज की थी, वह कभी तेज और कभी धीमा प्रदर्शन करता था. ये उन्हें इंसानों की थकान और नई ऊर्जा प्राप्त करने की अवस्था जैसा लगा. इसका नतीजा उन्होंने यह निकाला कि आण्विक स्तर पर डिटेक्टर भी काम, थकान और आराम की प्रक्रिया से गुजरता है. इसने उन्हें सजीव और निर्जीव के बीच संबंधों और उत्तेजनाओं के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया के अध्ययन के लिए प्रेरित किया.

बोस ने क्रेस्कोस्कोप नामक एक बेहद संवेदनशील उपकरण का आविष्कार किया जिससे पता चला कि पौधे भी दर्द महसूस कर सकते हैं और वे स्नेह और क्रोध जैसी भावनाओं पर प्रतिक्रिया करते हैं. उन्होंने अपने प्रयोगों के माध्यम से यह भी दर्शाया कि पौधों को क्लोरोफॉर्म लगाकर बेहोश किया जा सकता है. उनके इन प्रयोगों ने वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय को दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर दिया. उस दौर में बोस के क्रेस्कोस्कोप और अन्य उपकरण लोगों को जादुई लगते थे.

अपनी खोजों को दुनिया के सामने पेश करने का एक सुनहरा मौका उन्हें सन 1900 में अंतरराष्ट्रीय साइंस कांग्रेस, पेरिस में मिला. भारत में ब्रिटिश सरकार द्वारा पैदा की गई तमाम बाधाओं के बावजूद, बोस अंततः पेरिस जाने में सफल रहे. वहां उन्होंने ‘अकार्बनिक (इनऑर्गनिक) और सजीव पदार्थों की प्रतिक्रियाओं में समानता’ विषय पर अपना शोध पत्र पढ़ा. विज्ञान के इतिहास में पहली बार किसी ने उत्तेजनाओं के प्रति जीवित ऊतकों (टिश्यूज़) और अकार्बनिक पदार्थों की प्रतिक्रियाओं को एक-दूसरे के सामानांतर रखकर उनकी तुलना की थी. उनके इस भाषण की कई दिग्गज यूरोपीय वैज्ञानिकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की और इसे कांग्रेस का सबसे उत्कृष्ट भाषण माना.

इत्तेफाक से यहीं बोस की मुलाकात स्वामी विवेकानंद से भी हुई. कांग्रेस में बोस का भाषण सुनकर विवेकानंद गदगद हो गए. तब विवेकानंद ने बोस से कहा था, ‘आप अपना पूरा सामर्थ्य वैज्ञानिक अन्वेषण में लगाएं, इससे बढ़कर और कोई देशसेवा नहीं हो सकती.’ बोस साइंस कांग्रेस के बाद इंग्लैंड गए और वहां पर विभिन्न शोध परियोजनाओं का नेतृत्व किया.

अक्टूबर, 1903 में भारत लौटने तक उन्हें विश्व के एक सम्मानित वैज्ञानिक के रूप में मान्यता मिल चुकी थी. अब अंग्रेज़ सरकार उनकी अनदेखी नहीं कर सकती थी. भारत लौटने के बाद बोस ने अपने अनुसंधान कार्यों को जारी रखा. बोस को अपनी खोजों को व्याख्यान के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1907 में अमेरिका सहित यूरोप के विभिन्न देशों में भेजा. यहां उनको और उनकी खोजों को खूब सराहना मिली. हम कह सकते कि बोस के करियर की शुरुआत जितना संघर्षों से भरा रहा, बाद में उनके काम को उतना ही सरल सम्मान हासिल हुआ.

1915 में नौकरी से रिटायर होने के बाद बोस को सरकार ने पेंशन देने की बजाय पूरा वेतन देकर ‘प्रोफेसर एमेरिटस’ का दर्जा दिया. विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदानों को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने 1916 में उन्हें नाइटहुड (सर) की उपाधि से भी सम्मानित किया. बोस रॉयल सोसाइटी, लंदन के फेलो बनने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक भी बने (पहले गणितज्ञ: श्रीनिवास रामानुजन).

1917 में आज ही के दिन (30, नवंबर) बोस और उनके मित्रों (विशेषकर रवीन्द्रनाथ टैगोर) ने देशभर से चंदा इकट्ठा करके कलकत्ता में ‘बोस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (बसु विज्ञान मंदिर) की स्थापना की. यहीं पर बोस बतौर निदेशक जीवन-पर्यंत शोधकार्यों में जुटे रहे. आज भी यह इंस्टीट्यूट वैश्विक रुझानों के अनुरूप एशिया और भारत में अंतःविषय अनुसंधान (इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च) की अवधारणा को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है.

बोस एक देशभक्त और सांस्कृतिक राष्ट्रवादी थे. वे अंग्रेजों की गुलामी के सख्त खिलाफ थे. उनकी प्रबल राष्ट्रवादी भावनाओं की ही बदौलत रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, भगिनी निवेदिता, स्वामी विवेकानंद, जदुनाथ सरकार, आचार्य प्रफुल्लचंद्र रे आदि विभूतियों से उनके घनिष्ठ संबंध थे. कहा जाता है कि वे सक्रिय रूप से स्वतन्त्रता आंदोलन में कूदना चाहते थे, लेकिन उनके इन्हीं मित्रों ने उन्हें रोका और समझाया कि वे विज्ञान के जरिये भी देशसेवा कर सकते हैं.

23 नवंबर, 1937 को 80 साल की उम्र में आचार्य बोस का निधन हो गया. आज उन्हें मुख्य रूप से अंग्रेजों के उस बंधे-बंधाये ढर्रे को तोड़ने के लिए याद किया जाता है, जिसके तहत अंग्रेज मानते थे कि भारतीय लोग सटीक और श्रमसाध्य वैज्ञानिक चिंतन करने में सक्षम नहीं हैं. एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका ने 1945 में लिखा: “बोस का काम उनके समय से इतना आगे का था कि उस समय उसका सटीक मूल्यांकन संभव नहीं था.”

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