
1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में जन्मी महादेवी वर्मा की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई मिशन स्कूल इंदौर में हुई. 22 साल की उम्र में ही महादेवी वर्मा बौद्ध-दीक्षा लेकर भिक्षुणी बनना चाहती थीं, लेकिन महात्मा गांधी से मिलने के बाद अपना निर्णय बदल दिया और समाज सेवा में लग गईं. महादेवी वर्मा की पहचान एक उच्च कोटि की हिंदी कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षा-शास्त्री, महिला एक्टिविस्ट और साहित्यकार के तौर पर की जाती है. प्रस्तुत हैं उनकी दो कविताएं- ‘तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या’ और ‘मैं बनी मधुमास आली’
महादेवी वर्मा ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सिर्फ महिलाओं की समस्याओं को ही इंगित नहीं किया, बल्कि संपूर्ण नारीजगत को भारतीय संदर्भ में मुक्ति का संदेश भी दिया. उनके हृदय में बचपन से ही जीवों के प्रति करुणा और प्रेम भाव था. उन्हें ठंडक में कूं-कूं करते हुए पिल्लों का भी ध्यान रहता था. वो पशु-पक्षियों का लालन-पालन और उनके साथ खेलकूद में ही दिन बिताती थीं. चित्र बनाने का शौक भी उन्हें बचपन से ही था.
महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में जो पीड़ा, करुणा, वेदना और विद्रोहीपन था, वो उनके लेखन में भी दिखाई देता है. उनकी कविताओं में अहं, प्रेम और दार्शनिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता भी है, जिसके बीज उनके भीतर बहुत कम उम्र में ही पड़ गए थे.
1)
तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!
तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूं तेरी चंचल
और करूं जग में संचय क्या?
तेरा मुख सहास अरूणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल-खेल, थक-थक सोने दे
मैं समझूंगी सृष्टि प्रलय क्या?
तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूं क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या?
चित्रित तू मैं हूं रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?
2)
मैं बनी मधुमास आली!
मैं बनी मधुमास आली!
आज मधुर विषाद की घिर करुण आई यामिनी,
बरस सुधि के इन्दु से छिटकी पुलक की चांदनी
उमड़ आई री, दृगों में
सजनि, कालिन्दी निराली!
रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तारावली,
जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पंचम तान लीं;
बह चली निश्वास की मृदु
वात मलय-निकुंज-वाली!
सजल रोमों में बिछे है पांवड़े मधुस्नात से,
आज जीवन के निमिष भी दूत है अज्ञात से;
क्या न अब प्रिय की बजेगी
मुरलिका मधुराग वाली?
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Mahadevi Verma, Poem
FIRST PUBLISHED : November 30, 2023, 16:07 IST





